“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

हैरान हूँ

कृति त्रिपाठी

इंसान के इंसान को ना समझ पाने से परेशान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

इस झूठे संसार से अनजान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

जीती जागती इस दुनिया में बेजान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

क्या इतना आसान है

किसी की आत्मा को क्षण भर में कुचल देना?

क्या इतना आसान है

किसी के सपनों को पल भर में धूल कर देना?.

क्या इतना आसान है

किसी बिलखते हुए के आंसुओं को अनदेखा कर देना?

क्या इतना आसान है

पाप को भी पुण्य साबित कर देना?

क्या इतना आसान है

मंझधार में साथ छोड़ देना?

क्या इतना आसान है

किसी की आँखों में देखकर झूठ बोलना?

क्या इतना आसान है

किसी को उसके आवरण से तोलना?

क्या इतना आसान है

किसी के हृदय पर वार करना?

क्या इतना आसान है

किसी के वजूद पर सवाल खड़े करना?

क्या इतना आसान है

किसी के सच को झूठ करना?

क्या इतना आसान है

किसी की ईमानदारी को बेईमान करना?

क्या इतना आसान है

खुदा के सामने भी खुद को काफिर करार करना?

क्या इतना आसान है

खुद की अंतरात्मा को झुठलाना?

क्या इतना आसान है

अपनों से बेज़ार हो जाना?

क्या इतना आसान है

वाकिफ होते हुए भी अनजान हो जाना?

क्या इतना आसान है

किसी के जीवन के साथ खेल जाना?

क्या इतना आसान है

इंसान होते हुए भी इंसानियत का खो जाना?

क्या इतना आसान है

ये सब करते हुए भी अपनी भूल जान ना पाना?

अगर ये सब आसान है,

तो इस आसानी को ना समझ पाने की अपनी नाकामी पर,

मैं बेहद हैरान हूँ।

आत्मा तो मर चुकी है…..

जो भी बचपन में है  सीखा

उन सबको भूल जाने का

जो कुछ भी जाना हमने

उन बातो को ठुकराने का

आशाओं का उम्मीदों का

एक पल में टूट जाने का

दर्द के कडवे घूंटो को

पानी की तरह पी जाने का

ख्वाबो के सौ किले बनाकर

हकीकत में तोड़ते जाने का

जीवन का यही फलसफा है अपना

जीते जी मरते जाने का

 

रिश्ते नाते देख देखकर

जो भरोसा था भी हमको

वो सब भी उठ जाता है

तोड़ने हम रिश्ते सारे

जीने को अपने सहारे

आगे बढ़ते है एक कदम

फिर बाँध ले जाती है हमको

रिश्तो की ये बेड़ियाँ

खुद ही कूदता हूँ कुएं में

खुद ही झटपटाता हूँ

आँखे फोड़ के मन की फिरसे

मैं अँधा हो जाता हूँ.

 

घर में रेगिस्तान बसा है

मन में रेत सी भर चुकी है

जी रहा हूँ साँसे है पर

आत्मा तो मर चुकी है..