Being Un‘fair’

Once a girl whispered to the mirror, “Hey! I am so dark.” The mirror reiterated. But, the mind said something different, “So what! You are intelligent.” The mind is not uttering something unusual. It’s just echoing the words of our society, where we consider intelligence as a compensation for white skin. You might have heard people saying, “S/he is not fair, ATLEAST s/he is good with her or his academics.”  Be it energy, Bhagwan, Allah, Jesus or whosoever created us, did an experiment with a pigment called Melanin. This pigment became the determining factor for our skin, eye and hair colour. But the one, who gave us birth, did not distribute it equally. Apparently the ones who got more should have been privileged but the case became quite the opposite.  Our creator never knew the consequences of this unequal distribution.  Well, Indians must know it, as they are the perpetrators of extreme racism. One just needs to pick up a Sunday newspaper and read the matrimonial advertisements, which demand that a bride should be FAIR and LOVELY.

The concept of racism emerged during the 19th century, when scholars started assuming that humans can be divided into several races, which can be arranged hierarchically as they are on different levels of evolution. The Frenchman Comte Arthur de Gobineau divided humanity into three races-white, yellow and black, placing the white on the top of the ladder and black in the bottom. By moulding the views of theorists such as Charles Darwin and Herbert Spencer, new phenomena of Social Darwinism emerged emphasizing the concepts of natural selection and survival of the fittest in human society. These pseudo- scientific concepts made it the birthright of the Whites to exploit the so called Blacks. The Dutch who invaded South Africa in the 16th century, named the indigenous tribes as Hottentots (Khoikhoi) and Bushman (San). Both these terms conferred a sub-human status to these people. A large number of Africans were sailed through the Atlantic to the New World and sold as slaves to work on plantations. The colonised subjects of the European powers were thought to be uncivilized and barbarous, who could not govern themselves. In all these examples we see a common pattern, which is judgement based on one’s physical appearance. Barring people from their natural rights only on the basis of those physical features, which seem peculiar to one set of people, was the trend till the 20th century.

Indian television is full of advertisements that endorse skin whitening creams, soaps and talcum powders, pills and what not. Some brands even link fairness to a person’s career achievements. The Bollywood role models of this generation act as the brand ambassadors of such products, not contemplating about its serious consequences. Equating fairness with beauty has become so commonsensical that we have forgotten to question such nonsense. Indian children grow up in an atmosphere where these absurd concepts are regularly being discussed and acted upon, which leads to racism’s perpetuation in our society. The notion of fairness has penetrated the social media too. The Instagram generation never uploads a picture without using colour lightening and brightening filters. We might contend ourselves by thinking that it is a colonial legacy. Well, even if it is, then why are we carrying it forward, even after knowing that it is a farce? Skin colour is NOT a marker of a person’s physical or mental abilities, I repeat it never was and never will be of any importance.

The skin is just a cloth to cover our flesh. The cloth might be of any colour, but the material inside is exactly the same among all of us. Talking about the soul might seem a bit philosophical so let us ponder upon much easier stuff. When we see a childhood picture of ourselves, we exclaim, “Oh! This is me”. But if we compare our outer appearance to that innocent “me”, we can surely make out the difference that time has created over so many years. So, do we ever wonder that who is this “me”; we are talking about, when we see our old picture? Means there is something unchangeable inside us and that is what we really are and not this outer skin covering. Even after growing old when our skin will be saggy, that same “me” will remain inside. Life is all about knowing this inside “me” of ourselves and of others, rather than judging people on the basis of those age old parameters. It is high time that we stop believing and perpetuating such myths. And as they say, “True people fall in love with souls, not faces”.

Kriti Tripathi

विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

Manto, Saadat hasan, mottled Dawn: Fifty Sketches & Stories of Partition, Delhi, 2000, Introduction pp. 1-95 & 157-164

Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

साहनी, भीष्म, अमृतसर  आ गया है

कमलेश्वर, और कितने पाकिस्तान, मुंबई, 1969

rekhta. Org

shodhganga. Inflibnet.ac.in

Who was saadat Hasan Monto: A biography

वजाहत, असगर, जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ, वाणी  प्रकाशन] 2006

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/tobateksingh/

Thinking Beyond Their Age: An Introspective Analysis

bihar

-Kshitiz Roy

When I was a kid, I found myself in Bihar. And all I was told since class six was aise padho, waise padho. Words like career, inter ka exam, IIT, medical filled the air. You go to Patna and you will feel as if education is always on the top of its mind. So many falana sir, dhimkana sir coaching institutes dot the place; almost on the lines of age old dawa khana which promise masculinity and all, the tall hoardings of coaching institutes promising to turn Patna into Kota tower around the city.

You mount any passenger train in the morning and you are bound to bump into students chanting square roots and the genealogy of Samrat Ashok. And I am not even bringing the Banking SSC scene into the picture. Now in a state, which has always been so much into the awe of sarkari naukri and hence education, in a state, which has produced some of the finest technocrats and bureaucrats coming through the same examination procedure of Bihar education council or as we fondly say Bihar board- what went wrong. I took a stroll down the news feed and found various shades of people, mostly from Bihar indulged in self admonishing, some of them expectedly brought a political angle to it and were eager to guillotine Nitish Kumar and co.

All of that is farce. All of that is bullshit. Biharis don’t need to prove the nation about their educational prowess; because in a state which has historically been devoid of industrial and enterprising ecosystem, education has been our only way out into the mainstream, and this goes beyond those caste borderlines which we are quick to associate with Bihar. Scores of friends and seniors have found themselves in the corridors of the old Patna science college or a nondescript begusarai college to pass out in flying colors in engineering entrance examinations. You see, senior secondary has never been an issue in Bihar. They are taught to think beyond their age- socially and mentally. And therein lies the problem.

About the senior secondary examinations,we fondly call it inter ka exam and don’t give a rat’s ass about it. There were kids who would hate to prepare for 12th physics paper because yaar, IIT-JEE ka paper ki taiyari mein likhne ki aadat choot gayi thi and english toh boss likhe jamana ho gaya. The entire public consensus is heavily skewed in favor of attending those coaching institutes and solving high power books like Resnik Haliday and Irodov. In Bihar, for a large number of inter ke students, read 11th and 12th class wale, there is just no idea of schooling. They find themselves in dingy classrooms situated near a passing sewer, and are thrown into an abyss of formulas. Why? Because cracking a competition ensures a job, and a job ensures the upward mobility- in a state reeling between the twin malaise of class and caste discrimination, a job is the only thing which ensures you freedom. And therefore the coaching, therefore the complete denial of a senior secondary structure which has brought the rot. The teachers in the state sponsored colleges make merry, the kids in the coaching strut around on their bicycle on the streets of Patna without questioning and the parents keep dreaming about that job and the mukti. And for that, the whole senior secondary structure has been re shaped in an industry where questions are sneaked out-churning prodigal science toppers. This is because it simply doesn’t matter.

You see in Bihar, we are taught to think mechanically and practically. And while we think we are always so rational in all our deeds, biharis often forget that times around them changes. And this happens softly. But soft is a word which they don’t understand in Bihar. And till that happens, results like that are only a tip of the iceberg, which should never amaze a true bihari for our state is like that classic brewery where the educational system has been left rotting in order to create fine single malt human resource. To all those comparing the failed students with lalloo k laal, I urge you all to try a ninth class BTC maths test once. Boss fat k 74 ho jaega, kassam se.

मेरी आँख का काँटा….

मेरी आँख का काँटा मेरी आँखों को चुभता तो है पर दूसरो के आँखों में ज़रा सी धूल मुझे अधिक बेचैन कर देती है. वो धूल इसलिए अधिक दिखती है क्यूंकि दूसरो को परखना खुद को परखने से बहुत सरल होता है. और हो भी क्यूँ न, ये हमारे अहं की तृप्ति जो करता है. अपने स्वयं को जिस सांचे में ढाल लिया है हम चाहते है दुसरे भी उसिसांचे में ढल जाए. एक आस्तिक एक नास्तिक को हेय दृष्टि से देखता है और नास्तिक व्यक्ति सामने वाले को मुर्खाधिराज की उपाधि देने में देर नहीं लगाता. हेगेल ने कहा था कि “हर विचारक के अनुयायी यही समझते है कि उन्ही को एकमात्र सत्य व सर्वगुण संपन्न दर्शन की प्राप्ति हुई है, और यही कारण है कि वो अन्य सभी दर्शनों को हीन व अधूरा मानते है. ये अनुयायी इस विचार से प्रेरित है कि इनका दर्शन अपरिवर्तनीय, संपूर्ण व अंतिम सत्य है, इससे आगे कुछ और नहीं जानने को और इसके अलावा कोई और मार्ग नहीं है जानने का. अतएव ये सत्य प्रश्न व शंकाओ से परे है और किसी भी  आलोचना से इस ज्ञान की रक्षा आवश्यक है. ये दार्शनिक कदाचित ये नहीं समझ पाते कि सत्य की अनेकानेक परिभाषाएं वास्तव में सत्य का विस्तार करता है”.

मेरी आँख में लगी धूल  तुम्हे दुखी नहीं करती है ये तो तुम्हारा तरीका है अपनी शक्ति और सामर्थ्य के प्रदर्शन का. पावर हर जगह है बस हम कैसे उसका इस्तेमाल कर सकते है इसके बहुत से तरीके है. मेरी आँख में धूल के कण हम ढूंढें न ढूंढें लोगों के दिलो में कांटे ज़रूर बो देते है. और इस कटुता को छुपाने के बहुत से बहाने है हमारे पास- “मैं तो सच बोलने में यकीन रखता हूँ. सच तो हमेशा कड़वा होता है”. जी नहीं बंधु सत्य हमेशा कड़वा हो ये आवश्यक नहीं, काफी कुछ बोलने वाली की नीयत पर निर्भर करता है. जो दिल दुखाकर पूछते है कि “मैंने कुछ गलत बोला क्या?” जी हाँ बंधु. कई बार दोस्त हंसी मज़ाक में दूसरो को गालियाँ भी दे देते है और कोई बुरा नहीं मानता और कई बार हलकी फुलकी कोई छोटी सी बात बहुत गहरी चुभ जाती है. बोलने वाले की नीयत और सुनने वाले की सहनशीलता दोनों की परीक्षा है ये.

हाँ ये बात सत्य है कि ये बताना सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति आपकी किस बात पर बुरा मान ले. ये बताना कदापि संभव नहीं कि सामने वाला व्यक्ति आपकी बात को किस तरह ग्रहण करता है. “बुरा मान जाना” या “आपत्ति होना” अपने आप में एक मनोविज्ञान है जिसमे विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है, और इसलिए इस विषय को अगले लेख के लिए छोड़ देना बेहतर है. फिलहाल प्रश्न ये उठता है कि तेरी आँखों का मैल मेरी आँखों के कांटे से अधिक क्यूँ चुभता है. क्या इसलिए कि मेरी आँखों के कांटे ने मुझे इस कदर अँधा कर दिया कि अपनी आत्मा का अस्तित्व हमें नज़र नहीं आती. हम एक ऐसी ज़िन्दगी जी रहे है जो हम अपने आप के लिए नहीं बल्कि दूसरो के लिए जीते है, हर ख़ुशी को हर गम को तोलकर देखते है दूसरो के साथ. तो अगर मेरी एक आँख फूटी है तो मेरे पडोसी की दो फूट जाए. मेरे ६० नंबर बुरी बात है, मेरी दोस्त के ५५ आये दिल को थोडा सुकून मिला, खुद की आशाओ से हार गया लेकिन सामने वाले से तो जीत गया. मेरा अस्तित्व अस्तित्व कम अहं अधिक है. और शायद इसलिए हम दूसरो की आँखों का धूल  देखते है कि अपनी आँखों के कांटे से अपना ध्यान हटा सके.

हम सब नेता बनना चाहते है हमारे एक भैया कहते है. सच भी है, हम अपना ज्ञान तब तक अधूरा मानते है जब तक १० लोगों के सामने उसका पांडित्य प्रदर्शन न कर ले. ऐसे में ज्ञान का उद्देश्य हमारे अहं की तृप्ति हो जाती है. दूसरो के समक्ष खुद को ज्ञानी साबित करना, बेहतर साबित करना अपने आप में अलग अनुभूति है. वास्तव में हम पूरे संसार को या तो अपने प्रतिरूप के रूप में देखना चाहते है अथवा अपने अनुयायी के रूप में. मैं भी क्यूँ लिख रहा हूँ शायद इसलिए कि आप मेरी वाहवाही करे. आलोचना करेंगे तो मैं उसका प्रतिकार करूँगा क्यूंकि आपने मेरे लेख में मेरी आँख की धूल देख ली अब आपके कमेंट्स में आपके आँखों की धूल देखूंगा.

बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट के गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू के सातवे अध्याय में लिखा है बहुत खूब-

१.Judge not, that ye be not judged.
२ .For with what judgment ye judge, ye shall be judged: and with what measure ye mete, it shall be measured to you again.
३.And why beholdest thou the mote that is in thy brother’s eye, but considerest not the beam that is in thine own eye?
४.Or how wilt thou say to thy brother, Let me pull out the mote out of thine eye; and, behold, a beam [is] in thine own eye?
५.Thou hypocrite, first cast out the beam out of thine own eye; and then shalt thou see clearly to cast out the mote out of thy brother’s eye.

मुझे नहीं लगता इन पंक्तियों को समझाने की आवश्यकता है. हाँ भले ही लोगों को जज करना एक सामान्य मानवीय क्रिया भी हो सकती है, और इसमें कोई गुरेज़ भी नहीं, बर्शते नीयत सही हो. हर इन्सान अन्दर ही अन्दर इस बात से वाकिफ होता है कि उसने कोई बात क्यूँ कही है. तो कृपया-“तुम नाराज़ क्यूँ हो गए, मैंने ऐसा क्या कह दिया” वाली भोली शक्ल वाला दिखावा न ही करे तो बेहतर है. क्यूंकि फिराक गोरखपुरी जी बहुत सही कह गए है-

“जो मुझको बदनाम करे है काश वो इतना सोच सके;

मेरा पर्दा खोले है या अपना पर्दा खोले है”

इन सब बातों ने मेरी आदत छूटेगी न आपकी, बस इतना तो कर ही सकते है कि दूसरो की आँखों की धूल को देखते देखते कभी कभी अपनी आँखों से काँटा निकले का भी प्रयास कीजियेगा.क्या पता आँखों के मैल से अधिक भी कुछ दिखने लगे. और वो नहीं गाहे बगाहे कभी कभी अपने गिरेबान में भी झाँक कर देख लेना, क्या पता दूसरो के मीन मेख खोजते हुए अपने मन में कितनी कालिख पोत दी हो हमने. और ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए जो दूसरो में कमियाँ खोजते है, किसी के व्यवहार में, किसी के विचार में, किसी के आचार में, और जिनको कुछ नहीं मिलता वो शक्ल-सूरत में कमियाँ खोजते है. विचार की कमी खोजने को आलोचना समझ सकते है लेकिन जो आपके शरीर का आपके रूप का मखौल उदय वो तो निरीह वैमनस्यता ही है.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

A Letter From Mahatma

-Kshitiz Roy

 

 

modi-gandhi
Gandhi to Modi

Dear Mr Modi,

Of late, the angles of heaven have been telling me interesting stories about my beloved India. The politics had never been so political, I am told. In a classically hysterical way, much like the mass media of our times, I have been warned about the fact that another lad from the holy land of Gujarat is hell bent upon rendering my ideals redundant. The other day, during our daily evening walk with Mr. Nehru in the alleys of Indra Palace, I found him deeply distressed about the current political undertones of his beloved India, something which he feels he had invented in 1947, I was told that you have unleashed another wave of communal hatred in the country. Let alone the planet earth, your political gimmicks have caused enough ripples to unsettle the settled political souls of the departed. Mr Modi, I am not too sure whether you are still into reading this letter or have just gone about tweeting me on social media, but let’s get this clear at the outset that despite the venomous anti- Modi campaign, those sikulars( I have also been told that the new wave social media pundits schooled by you have re phrased the word secular) have unleashed worldwide and here in the heaven, I am pleasantly appalled by you. You see, just like you, I could never come to terms with these heavy, west imported slang like Secularism and democracy. Just like you, I wish we could never have to be a secular democracy. This is India, and we have got the right to imagine our polity on the ancient Hindu lines, a polity which is dictated by our reverend mothers – Bharat and Cow; a polity based on the great Hindu idea of purity and caste hierarchies; a polity based not on the foreign idea of constitutionalism but on the very Indian idea of Sanskaar – the ancient Hindu culture. What if the whole potpourri would have been a slightly confused one, at least that way we could have been more Indian as a nation. You see, this is all I had fought for throughout my life; but blame it on the Oxford educated, scotch gurgling brigade of anti-national intellectuals disguised as Nehru and Co, our country was soon made captive to the colonial construct of polity. Independent India, my friend, was nothing but the biggest colonial mirage of 20th century, whose world view and imagination were kept captive at the doors of Mountbatten, errr, Edvina. I could have resisted, I should have done another satyagrah, but kid, by the time 1947 happened I was too old and jaded to take on the blabbering Nehru.
You sir, you have bewitched me for quite some time. It is now when I look at you, I feel that the dawn has come. You have single handedly taken upon your shoulders– the responsibility to rip this nation out of the colonial hangover. A look at you and I can’t help myself marvel over the divine similarities we both share. A look at you, and I feel that you are the one who will one day realize my long smoldering dream of creating a Bharat in an India. Sometimes, I see my redemption in you. I had long harbored similar dreams in my head and heart; but I could never articulate it in front of Nehru. For he was close with Mr. Ghanshyam Birla, and they together fashioned the myth of Mahatma I enjoy today. You my friend Modi, have gone a step beyond and have the tamed all the Birlas and Adanis of the nation. And this is one achievement I wish I could ever do in my lifetime. It is one thing to be revered, it is just another to rule. And for the latter, you need to enjoy financial autonomy. This is where we differ, and oh how!

Kid, when I look at you, I can’t help but marvel about all these similar political vision we share. It feels that we are two prodigies from the same school of politics, just that I am your old guy who is selectively and conveniently remembered. First of all, let’s get the Gujarat connection out of the way. By now, the nation must have realized that Gujarat is the official kinder-garden of Indian politics. While the other provinces of the nation produce political leaders, Gujarat is from where legends come. Let’s count LK Advani as an aberration. See kid, you always had in you. You have mastered the art of being a news maker long ago, since way back in 2002, if my memory serves me right. While there are many who go berserk about this, but I find nothing wrong with it – that’s what all great leaders do. They learn how to be the news. Look at me; this is something what I did so brilliantly throughout the national movement. I am not easily impressed by the smear campaign they have unleashed against you. I know what it takes to be the king of the pack. Ask me, I have been dealing with all kinds of verbal pleasantries throughout my life; even when I am dead. That’s the side effect of being great. That’s the side effect of being political. You see when you are there in this game for a long haul; there are choices you have to make, there are silences you have to choose. They would criticize you heavily for your selective diatribe and convenient silences against poverty, unemployment and so and so on. Poverty, my friend, as you might have known by now, is a historic construct just like communal ism. No sane political power ever interferes to do anything with it. I have seen many bright European minds dealing about it and trust me, maintaining status quo is the ultimate political success. Those who succeed in this race of power don not provide a solution to these social ils, they learn how to play along. Political criticism, my friend is a funny business. It is often taken up by those who don’t know an inch about politics. And trust me; this country would ever be brimming with such people, often found wanting in historical sensibilities and replete with a myopic sense of social commentary.

By the time India was free, I had lost my appetite for politics, and thanks to Mr Godse, who in his uniquely Hindu way, ensured that I attain ‘Moksha’ at the most suitable juncture of time, I find myself unable to comment about post independent India. Now, because I have practiced enough of politics in my sojourn through Indian political struggle, I know very well that you need to be selfish in order to rule. Those who haven’t and will never taste the political waters of this nation will never know about the art of ruling. And going by the limited knack of legality and political acumen I possess, I feel there is nothing wrong with you. If at all anywhere, this is where you seemed to have excelled. My heart fills with pleasure unbound when I find you taking cues from my book. People have tried hard enough to tear us apart ideologically – but let me clear the air once and for all. I have never seen a PM going back in time and taking cues from my book. It is when I see you approaching the historical social malaise of cleanliness through my lenses in your brilliantly designed Swacch Bharat campaign; it is when I see your satyagrah against the black money hoarders; it is when I see you clashing swords with an entire army of intellectuals beating around the bushes of JNU, my heart resonates with tour vision. Those who don’t know me have tried to pitch us together as enemies, as two antithetical political characters sitting on the opposite fences of ideology. And this is where; I would have loved to share a loud laughter with you for both of us, being the foxy Gujju bhai we are, and very well know that ideology is just another cloak to enjoy brute power. And talking about ideology, no matter how many PHDs, they would keep distributing across the length and breadth of the nation, they would never get hold of my idea of India. For they Dear Mr Modi, don’t know that just like you I harbored a deep distrust towards things and ideas imported from the west. West is waste. In the last few years, people on the other side of the fence, have ridiculed you with the epithets of dictator, communal, divisive, pompous and what not. You have been accused of trying to belittle the constitutional institutions. Mr Nehru sends his deepest anguishes in the strongest of anglicized words, for dismantling his baby – the planning commission. No matter how many times I told him that Neeti sounds more Bhartiya, he won’t budge but let’s not get into his petty childishness. You see, the NEHRUS have always been childish. You have Rahul to vouch for this, right? Back to your intelligent fondling with the so called idea of constitutionalism, I think it’s quite prudent of you to take such decisions. Legally speaking, you have always been around the best of judges. And ideally, I would have wanted to dislodge the entire constitution itself to make way for a more suitable version of Ram Rajya based on the teachings of Tulsi and Geeta. Those who don’t know me personally are bound to make mistake us as political enemies. You, Mr Modi, are a numb version of my prime. Those who wish to project me as an epitome of tolerance, and you as one destructive fellow, fail to realize that Gandhi would have ideally wanted to get rid of the police, the judiciary and ideally even the constitution. For they are nothing but figments of western imagery, coming straight out of the womb of a western enlightenment, suited to their colonial apparatus with little but no significance to the poor Indians. I am glad that you have taken the onus upon yourself to scratch their underbellies.

The queer thing with legends is that they stick in the public imagery, for reasons weird enough to be known even to them. Take me for example, 100 years after the Champaran revolt, for which people have kindly held me responsible, I am yet to fathom my role in it. All I remember doing there was making those poor filthy Biharis dig latrines and ensure that they don’t die of malaria. Trace the legal status of the Champaran case, and you would be in for the surprise of your life. Law, it takes its own strides. But the thing with India is people here are more interested in lapping up the legends and myths more than the minutes of law. And this is precisely what you are enjoying today. My eyes fill with the purest of tears, when I see Indians rallying behind another Mota Bhai from my mother land. And till the time, you are making the news; they are going to love you.

I can see the spark in your eyes; the hunger to be the shepherd of the herd called Indians, something which I had long tried my hands at. And it is where I would like to shake you out of the political orgasm you are enjoying of late. Power, just like the body, is mundane. And given how spiritual we all are, I know that you know that all of this is Maya. The traditional schools of philosophy confirm this that every flower that blossoms one day has to become mere dust. And such is the case with legends too. We are all bound to be forgotten. We are all bound to be tucked into neat museums and statues and streets named after us. Nobody remembers the legacy, nobody remembers the deeds, – everything about a legend – his ideas, his ideology, his vision, his dreams – all of that is bound to be flushed through the annals of history and history, my friend, is a very cruel and unforgiving dungeon. It treats you the way you just can’t imagine in your lifetime. Ask Nehru, he would swear by what I say. Therefore there is this unsolicited piece of advice, which I would like to give you. I know you have got another Mota bhai from Gujarat, Mr Shah for your daily dose of advises and you don’t quite believe in being advised, but take it as a token of appreciation from this grand old man. Kid, the road to power might be a political journey, but clutching on to it is quite a lonesome one. And it is where you need to listen to your soul. As and when your schedule permits it, please do listen to that voice of the soul. It never lies and once in a while it is better to hear the truth, however unpleasant it might be. Life often appears to be one long orgasmic session when you are in your prime, and once that happens, it is when in a democracy the people fuck you. I pray that this doesn’t happen with you for Bharat, more than India needs you to steer its way out of the abyss of colonial hangover towards an independent imagination of itself. I wish you all the luck in your mission. I would be following you closely around, not on twitter though but in those oft repeated bouts of political comparisons.

Signing off from heaven,
Bapu.

बुजुर्ग

बुजुर्ग

-संतोष कुमार

 

घर में पार्टी जैसा माहौल. काफी चहल पहल. बच्चे आपस में शोरगुल और मौज मस्ती करते हुए. बड़े भी आपस में गपशप करते हुए. इसी शोरगुल के बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति कमरे में दाखिल होता है. कुछ पल में कमरे में शोर थोडा कम हो जाता है. बुजुर्ग चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ जाता है.

बेटा : पापा आप बेकार में आ गए यहाँ. अब बच्चो और हम जवानो के बीच बोर हो जायेंगे.

बुजुर्ग: अकेले कमरे में मन नहीं लग रहा था.

बेटा(कुछ उखड़कर): आ ही गए है तो बैठ जाईये

एक परिचित: सच बताईये अंकल जी, अकेले में डर तो नहीं लग रहा था न. जस्ट जोकिंग!!

बुजुर्ग एक पल उसे देखता है, फिर अपने बेटे को देखता है.

बुजुर्ग: खाली कमरे में डर नहीं लगता अब, भरी महफ़िल में दम घुटने लगा है…… बेटा इन्सान तब अकेला होता है जब अपने भी गैर लगने लग जाते है. जस्ट जोकिंग!!

(दोनों के मुंह बन जाते है)

बेटा: (आहिस्ता से दोस्त को कहता है)जब से माँ गयी है तब से उनका बर्ताव कुछ बदल सा गया है. उनको हम पर विश्वास नहीं रहा शायद. उनको लगता है हमने माँ का ठीक से ख्याल नहीं रखा.

(ये सुनते ही बुजुर्ग को पुरानी बाते याद आने लगती है)

बुजुर्ग और उसकी पत्नी कई सालो पहले टकटकी लगाये दरवाज़े पर बैठे है. पत्नी व्याकुल होकर इधर उधर फिर रही है जबकि बुजुर्ग थक कर सोफे पर बैठ जाता है.

पत्नी: कोई खबर आई? कोई फ़ोन, मेसेज?

बुजुर्ग: कुछ भी नहीं.

पत्नी: लगता है भूल गया है हमें. समझते है काम करता है, बिजी रहता है इसलिए खुद नहीं आ सकता पर कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता है.

बुजुर्ग: इतनी टेंशन रहती है, भूल गया होगा.

पत्नी: कल को अपने माँ बाप को तो नहीं भूल जायेगा न?

बुजुर्ग: क्यूँ इतना नेगेटिव सोचती हो?

पत्नी: जब पढने के लिए बाहर गया तो हमने कभी शिकायत नहीं की. सोचा पढ़ रहा होगा भूल गया होगा. छुट्टियों में घर नहीं आया बोला पढ़ रहा हूँ. पढाई ख़त्म हुई तो शहर में नौकरी ले ली वापस नहीं आया. न खुद आता है न हमें आने देता है, कहता है अपना घर नहीं बनाया. अरे घर तो लोगों से बनता है, वरना तो ईंटो का ढेर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं (बुरी तरह खांसने लगती है)

बुजुर्ग: तुम क्यूँ अपनी तबियत ख़राब करती हो? क्यूँ उसके लिए अपना दिल जलाती हो?

पत्नी: सोचती हूँ अगर जिंदा नहीं तो कम से कम मेरी लाश को देखने तो ज़रूर आएगा! (आंसू आ जाते है)

(वापस वर्तमान में)

बुजुर्ग(आहिस्ता से): तुम आये भी तो किसलिए….. जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया!! तू जब नहीं था तो तेरी माँ तिल तिल करके मरी, अब तू है तो भी तिल तिल करके मर रहा हूँ.

(इससे पहले कि बात और गंभीर हो जाये. बुजर्ग को बच्चे बुजुर्ग को घेर लेते है. बुजुर्ग का ध्यान भंग होता है)

बच्चे: दादा जी कहानी सुनाइए न. पापा ने बोला आप अच्छी कहानी सुनाते हो.

बेटा: अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था. चलो बच्चो सोने जाओ.

बच्चे: नहीं अब तो कहानी सुन के रहेंगे. दादा जी सुनाइए न

बुजुर्ग: मुझे सचमुच कोई कहानी नहीं आती.

बेटा: अब सुना भी दीजिये बच्चो का मन रखने के लिए. बस अपने गाँव की कहानी मत सुनाने लगना.

बुजुर्ग: ठीक है सुनाता हूँ.  ध्यान से सुनो. (कहानी को मजाकिया लहजे में कहने का प्रयास करता है लेकिन कई चेहरे और आवाज़ में असली भाव दिख जाते है और पता चल जाता है की कहानी वो नहीं जो बच्चे सुन रहे है कहानी वो है जो वो छुपाने का प्रयास का कर रहा है पर उसकी आँखें उसको धोखा दिए जा रहा है. उसकी आँखों में वो कहानी दिख जाती है जो शब्दों से पता नहीं चलती)

बहुत पहले की बात है. एक जोकर था. उसका काम था लोगों को हँसाना. वो उलटे पुल्टे करतब करता, उलटे सीधे मुंह बनाता, उछलता कूदता और सब खूब हँसते. सब उसे बहुत पसंद करते थे, जहाँ जाता महफ़िल जमा देता था, लोग उससे मिलने, उससे बात करने को आतुर रहते. पर धीरे धीरे वो जोकर बुड्ढा होने लगा. उछलना कूदना कम हो गया, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी, शरीर कमज़ोर हो गया. एक बार  उछलने कूदने लगा तो कमर लचक गयी, फिर तो वो जो रोया जो रोया कि लोगों की हंसी छूट गयी. जोकर रोता रहा लोग हँसते रहे.जब वो जोकर अपनी  कमर पकड़कर चल रहा था तो लोगों को बहुत हंसी आई. उस दिन उस जोकर को एहसास हुआ कि लोग उसके मज़ाक पर नहीं, उसपर हँस रहे थे. वो रोयेगा लोग हंसेगे, उसे चोट लगेगी तो लोगों को लगेगा मज़ाक कर रहा है. तो पता है उसने क्या किया?

बच्चे: क्या? (हैरत से)

उसने एक गुब्बारा बनाया. बहुत बड़ा जादुई गुब्बारा. सो भी दर्द जो भी दुःख, सारे आंसू, उस गुब्बारे में भरते जाता था और बदले में उस गुब्बारे से झूठी हंसी और दुसरो के लिए खुशियाँ ले जाता था. तो वो रोज़ सुबह शाम लोगों को खूब हंसाता खूब खुश करता और रात को गुब्बारे के सामने खूब रोता. गुब्बारा फूल फूल के बहुत बड़ा हो गया, और एक दिन…. फट गया. जोकर मरने लगा.  लेकिन जब लोगों ने मरते हुए जोकर को देखा तो उनकी हंसी छूट गयी…. चेहरे पे रंग पुता हुआ, दर्द से कराहता हुआ जोकर बड़ा फनी लग रहा था. कुछ लोगों को ये भी लगा कि मरने का नाटक कर रहा है अभी उठ खड़ा होगा. सब हँसते रहे, हँसते रहे और जोकर…. मर गया! पता है मरने से पहले जोकर के आखिरी शब्द क्या थे- “मुझे गुदगुदी करो, गाना गाओ, कोई जोक सुनाओ, मुझे हंसाओ कोई. मैं हँसना चाहता हूँ, रोना नहीं चाहता…रोना नहीं चाहता”. अरे कोई तो गुदगुदी करो, गुदगुदी करो!!

बच्चो ने गुदगुदी शब्द सुना तो हंसने लगे. “जोकर को गुदगुदी करो, जोकर को हँसना था. जाते जाते भी जोकर ने जोक ही  सुनाया. मुझे हंसाओ, मैं मर रहा हूँ!!” फिर बच्चे और जोर से हंसने लगे. एक बच्चा जोर जोर से बोलता और हँसता- “दादाजी ने आज क्या जोक सुनाया- जोकर कह रहा है लोगों से कि मुझे हंसाओ! मरता आदमी भी ऐसा बोलता है क्या, ये जोकर सचमुच जोकर था!!” बच्चे जोर से हँस रहे थे और बड़े भी मुस्कुराने लगे. लेकिन बुजुर्ग के आँखों से झर झर आंसू बहने लगे. अपने आंसू छुपाने के लिए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

“वो रो रहे थे क्या?

“लेकिन मजाकिया कहानी में कोई रो कैसे सकता है?”

बुजुर्ग अपने आंसुओ पे काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँचता है लेकिन कमरे में जाते ही वो फूट फूट कर रोने लगता है. काफी देर तक रोता रहता है. फिर दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट होती है. बुजुर्ग जल्दी से अपने आंसू पोंछता है. उसे आशा थी कि शायद कोई उसकी कहानी का असली मतलब समझकर उसे सांत्वना देने आया है. पर दरवाज़ा खोला तो एक बच्चा खड़ा था.

बच्चे ने पूछा- “गुब्बारा फटने से जोकर मरा कैसे?”

“वो गुब्बारा उसका सहारा था, वो जरिया था अपनी बात कहने का. बिना सहारे कैसे जीता?”

“बड़ा पागल था जोकर. जब पता था कि गुब्बारा फट जायगा तो उतना भरा ही क्यूँ”

“दुःख बहुत अजीब चीज़ होती है बेटा. ये जीने का सहारा भी बनती है और मरने की वजह भी”

“ऐसा गुब्बारा असल में होत्ता है क्या दादाजी ?

“हाँ सब के पास होता है. कई लोग उसको दिल भी कहते है”. फिर अपने आप से –“जाने कब से इंतज़ार में हूँ. बस भरता जा रहा है, जाने कब फटेगा”. धीमे धीमे गाने लगता है-

“न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग

न नातो का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहाँ आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं”

कितना आसान है रुला देना किसी को;

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से- सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए, न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें कोई ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए”

 

बुजुर्ग खाने की मेज़ पर आता है तो बच्चे फिर उसे घेर लेते है.

“एक सवाल तो पूछना भूल ही गया दादाजी?

“पूछो?”

“जोकर की मौत के बाद उसके परिवार का क्या हुआ?

“बड़े होकर उसका बेटा भी जोकर बन गया. वो भी बुड्ढा हुआ, उसे भी गुब्बारा मिला और वो भी रोते हुए मर गया और लोग हमेशा की तरह हँसते रहे. और ये दास्तान चलती रही”. ये कहकर बुजुर्ग ने अपने बेटे की ओर देखा. उसके बेटे के हाथ से चम्मच छूट गयी, और वो आवाक होकर अपने पिता को देखता रहा. आखिर में बस यही बोल पाया-

“न ये मजाकिया है, और न ये कहानी है”

“जानते हो वो गुब्बारा क्या है बेटा”

बेटा इसका जवाब नहीं सुनना चाहता था, वो जानता था उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत उस में नहीं है.

“कुछ बहता हुआ सा मन मे है

जो बाहर आना चाहता है

है लावा या तूफान कोई

अंदर ही घुटता जाता है

सीने मे जलन करता है कभी

सपने या भ्रम बनता है कभी

ना रोता है ना हंसता है

अंदर ही अंदर डसता है

है लावा या तूफान कोई ये

जो मेरे अंदर बसता है

चिल्लाने को जी चाहता है

फट जाने को जी चाहता है

इतना बेचैन फिर रहा हूँ अब

थम जाने को जी चाहता है

उसे बाहर निकालू तो कैसे

वो कौनसा रास्ता जाता है

जो बाहर निकाले इसको मन से

दलदल मे फँसता जाता है

है लावा या तूफान कोई ये

बिन पूछे घुसता जाता है

ये हर दिन बढ़ता जाता है

मैं हर दिन झुकता जाता हूँ

मेरे अंदर का तूफान मेरा

अक्स बनते जाता है”