“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

बुजुर्ग

बुजुर्ग

-संतोष कुमार

 

घर में पार्टी जैसा माहौल. काफी चहल पहल. बच्चे आपस में शोरगुल और मौज मस्ती करते हुए. बड़े भी आपस में गपशप करते हुए. इसी शोरगुल के बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति कमरे में दाखिल होता है. कुछ पल में कमरे में शोर थोडा कम हो जाता है. बुजुर्ग चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ जाता है.

बेटा : पापा आप बेकार में आ गए यहाँ. अब बच्चो और हम जवानो के बीच बोर हो जायेंगे.

बुजुर्ग: अकेले कमरे में मन नहीं लग रहा था.

बेटा(कुछ उखड़कर): आ ही गए है तो बैठ जाईये

एक परिचित: सच बताईये अंकल जी, अकेले में डर तो नहीं लग रहा था न. जस्ट जोकिंग!!

बुजुर्ग एक पल उसे देखता है, फिर अपने बेटे को देखता है.

बुजुर्ग: खाली कमरे में डर नहीं लगता अब, भरी महफ़िल में दम घुटने लगा है…… बेटा इन्सान तब अकेला होता है जब अपने भी गैर लगने लग जाते है. जस्ट जोकिंग!!

(दोनों के मुंह बन जाते है)

बेटा: (आहिस्ता से दोस्त को कहता है)जब से माँ गयी है तब से उनका बर्ताव कुछ बदल सा गया है. उनको हम पर विश्वास नहीं रहा शायद. उनको लगता है हमने माँ का ठीक से ख्याल नहीं रखा.

(ये सुनते ही बुजुर्ग को पुरानी बाते याद आने लगती है)

बुजुर्ग और उसकी पत्नी कई सालो पहले टकटकी लगाये दरवाज़े पर बैठे है. पत्नी व्याकुल होकर इधर उधर फिर रही है जबकि बुजुर्ग थक कर सोफे पर बैठ जाता है.

पत्नी: कोई खबर आई? कोई फ़ोन, मेसेज?

बुजुर्ग: कुछ भी नहीं.

पत्नी: लगता है भूल गया है हमें. समझते है काम करता है, बिजी रहता है इसलिए खुद नहीं आ सकता पर कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता है.

बुजुर्ग: इतनी टेंशन रहती है, भूल गया होगा.

पत्नी: कल को अपने माँ बाप को तो नहीं भूल जायेगा न?

बुजुर्ग: क्यूँ इतना नेगेटिव सोचती हो?

पत्नी: जब पढने के लिए बाहर गया तो हमने कभी शिकायत नहीं की. सोचा पढ़ रहा होगा भूल गया होगा. छुट्टियों में घर नहीं आया बोला पढ़ रहा हूँ. पढाई ख़त्म हुई तो शहर में नौकरी ले ली वापस नहीं आया. न खुद आता है न हमें आने देता है, कहता है अपना घर नहीं बनाया. अरे घर तो लोगों से बनता है, वरना तो ईंटो का ढेर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं (बुरी तरह खांसने लगती है)

बुजुर्ग: तुम क्यूँ अपनी तबियत ख़राब करती हो? क्यूँ उसके लिए अपना दिल जलाती हो?

पत्नी: सोचती हूँ अगर जिंदा नहीं तो कम से कम मेरी लाश को देखने तो ज़रूर आएगा! (आंसू आ जाते है)

(वापस वर्तमान में)

बुजुर्ग(आहिस्ता से): तुम आये भी तो किसलिए….. जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया!! तू जब नहीं था तो तेरी माँ तिल तिल करके मरी, अब तू है तो भी तिल तिल करके मर रहा हूँ.

(इससे पहले कि बात और गंभीर हो जाये. बुजर्ग को बच्चे बुजुर्ग को घेर लेते है. बुजुर्ग का ध्यान भंग होता है)

बच्चे: दादा जी कहानी सुनाइए न. पापा ने बोला आप अच्छी कहानी सुनाते हो.

बेटा: अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था. चलो बच्चो सोने जाओ.

बच्चे: नहीं अब तो कहानी सुन के रहेंगे. दादा जी सुनाइए न

बुजुर्ग: मुझे सचमुच कोई कहानी नहीं आती.

बेटा: अब सुना भी दीजिये बच्चो का मन रखने के लिए. बस अपने गाँव की कहानी मत सुनाने लगना.

बुजुर्ग: ठीक है सुनाता हूँ.  ध्यान से सुनो. (कहानी को मजाकिया लहजे में कहने का प्रयास करता है लेकिन कई चेहरे और आवाज़ में असली भाव दिख जाते है और पता चल जाता है की कहानी वो नहीं जो बच्चे सुन रहे है कहानी वो है जो वो छुपाने का प्रयास का कर रहा है पर उसकी आँखें उसको धोखा दिए जा रहा है. उसकी आँखों में वो कहानी दिख जाती है जो शब्दों से पता नहीं चलती)

बहुत पहले की बात है. एक जोकर था. उसका काम था लोगों को हँसाना. वो उलटे पुल्टे करतब करता, उलटे सीधे मुंह बनाता, उछलता कूदता और सब खूब हँसते. सब उसे बहुत पसंद करते थे, जहाँ जाता महफ़िल जमा देता था, लोग उससे मिलने, उससे बात करने को आतुर रहते. पर धीरे धीरे वो जोकर बुड्ढा होने लगा. उछलना कूदना कम हो गया, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी, शरीर कमज़ोर हो गया. एक बार  उछलने कूदने लगा तो कमर लचक गयी, फिर तो वो जो रोया जो रोया कि लोगों की हंसी छूट गयी. जोकर रोता रहा लोग हँसते रहे.जब वो जोकर अपनी  कमर पकड़कर चल रहा था तो लोगों को बहुत हंसी आई. उस दिन उस जोकर को एहसास हुआ कि लोग उसके मज़ाक पर नहीं, उसपर हँस रहे थे. वो रोयेगा लोग हंसेगे, उसे चोट लगेगी तो लोगों को लगेगा मज़ाक कर रहा है. तो पता है उसने क्या किया?

बच्चे: क्या? (हैरत से)

उसने एक गुब्बारा बनाया. बहुत बड़ा जादुई गुब्बारा. सो भी दर्द जो भी दुःख, सारे आंसू, उस गुब्बारे में भरते जाता था और बदले में उस गुब्बारे से झूठी हंसी और दुसरो के लिए खुशियाँ ले जाता था. तो वो रोज़ सुबह शाम लोगों को खूब हंसाता खूब खुश करता और रात को गुब्बारे के सामने खूब रोता. गुब्बारा फूल फूल के बहुत बड़ा हो गया, और एक दिन…. फट गया. जोकर मरने लगा.  लेकिन जब लोगों ने मरते हुए जोकर को देखा तो उनकी हंसी छूट गयी…. चेहरे पे रंग पुता हुआ, दर्द से कराहता हुआ जोकर बड़ा फनी लग रहा था. कुछ लोगों को ये भी लगा कि मरने का नाटक कर रहा है अभी उठ खड़ा होगा. सब हँसते रहे, हँसते रहे और जोकर…. मर गया! पता है मरने से पहले जोकर के आखिरी शब्द क्या थे- “मुझे गुदगुदी करो, गाना गाओ, कोई जोक सुनाओ, मुझे हंसाओ कोई. मैं हँसना चाहता हूँ, रोना नहीं चाहता…रोना नहीं चाहता”. अरे कोई तो गुदगुदी करो, गुदगुदी करो!!

बच्चो ने गुदगुदी शब्द सुना तो हंसने लगे. “जोकर को गुदगुदी करो, जोकर को हँसना था. जाते जाते भी जोकर ने जोक ही  सुनाया. मुझे हंसाओ, मैं मर रहा हूँ!!” फिर बच्चे और जोर से हंसने लगे. एक बच्चा जोर जोर से बोलता और हँसता- “दादाजी ने आज क्या जोक सुनाया- जोकर कह रहा है लोगों से कि मुझे हंसाओ! मरता आदमी भी ऐसा बोलता है क्या, ये जोकर सचमुच जोकर था!!” बच्चे जोर से हँस रहे थे और बड़े भी मुस्कुराने लगे. लेकिन बुजुर्ग के आँखों से झर झर आंसू बहने लगे. अपने आंसू छुपाने के लिए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

“वो रो रहे थे क्या?

“लेकिन मजाकिया कहानी में कोई रो कैसे सकता है?”

बुजुर्ग अपने आंसुओ पे काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँचता है लेकिन कमरे में जाते ही वो फूट फूट कर रोने लगता है. काफी देर तक रोता रहता है. फिर दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट होती है. बुजुर्ग जल्दी से अपने आंसू पोंछता है. उसे आशा थी कि शायद कोई उसकी कहानी का असली मतलब समझकर उसे सांत्वना देने आया है. पर दरवाज़ा खोला तो एक बच्चा खड़ा था.

बच्चे ने पूछा- “गुब्बारा फटने से जोकर मरा कैसे?”

“वो गुब्बारा उसका सहारा था, वो जरिया था अपनी बात कहने का. बिना सहारे कैसे जीता?”

“बड़ा पागल था जोकर. जब पता था कि गुब्बारा फट जायगा तो उतना भरा ही क्यूँ”

“दुःख बहुत अजीब चीज़ होती है बेटा. ये जीने का सहारा भी बनती है और मरने की वजह भी”

“ऐसा गुब्बारा असल में होत्ता है क्या दादाजी ?

“हाँ सब के पास होता है. कई लोग उसको दिल भी कहते है”. फिर अपने आप से –“जाने कब से इंतज़ार में हूँ. बस भरता जा रहा है, जाने कब फटेगा”. धीमे धीमे गाने लगता है-

“न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग

न नातो का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहाँ आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं”

कितना आसान है रुला देना किसी को;

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से- सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए, न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें कोई ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए”

 

बुजुर्ग खाने की मेज़ पर आता है तो बच्चे फिर उसे घेर लेते है.

“एक सवाल तो पूछना भूल ही गया दादाजी?

“पूछो?”

“जोकर की मौत के बाद उसके परिवार का क्या हुआ?

“बड़े होकर उसका बेटा भी जोकर बन गया. वो भी बुड्ढा हुआ, उसे भी गुब्बारा मिला और वो भी रोते हुए मर गया और लोग हमेशा की तरह हँसते रहे. और ये दास्तान चलती रही”. ये कहकर बुजुर्ग ने अपने बेटे की ओर देखा. उसके बेटे के हाथ से चम्मच छूट गयी, और वो आवाक होकर अपने पिता को देखता रहा. आखिर में बस यही बोल पाया-

“न ये मजाकिया है, और न ये कहानी है”

“जानते हो वो गुब्बारा क्या है बेटा”

बेटा इसका जवाब नहीं सुनना चाहता था, वो जानता था उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत उस में नहीं है.

“कुछ बहता हुआ सा मन मे है

जो बाहर आना चाहता है

है लावा या तूफान कोई

अंदर ही घुटता जाता है

सीने मे जलन करता है कभी

सपने या भ्रम बनता है कभी

ना रोता है ना हंसता है

अंदर ही अंदर डसता है

है लावा या तूफान कोई ये

जो मेरे अंदर बसता है

चिल्लाने को जी चाहता है

फट जाने को जी चाहता है

इतना बेचैन फिर रहा हूँ अब

थम जाने को जी चाहता है

उसे बाहर निकालू तो कैसे

वो कौनसा रास्ता जाता है

जो बाहर निकाले इसको मन से

दलदल मे फँसता जाता है

है लावा या तूफान कोई ये

बिन पूछे घुसता जाता है

ये हर दिन बढ़ता जाता है

मैं हर दिन झुकता जाता हूँ

मेरे अंदर का तूफान मेरा

अक्स बनते जाता है”

 

आत्मा तो मर चुकी है…..

जो भी बचपन में है  सीखा

उन सबको भूल जाने का

जो कुछ भी जाना हमने

उन बातो को ठुकराने का

आशाओं का उम्मीदों का

एक पल में टूट जाने का

दर्द के कडवे घूंटो को

पानी की तरह पी जाने का

ख्वाबो के सौ किले बनाकर

हकीकत में तोड़ते जाने का

जीवन का यही फलसफा है अपना

जीते जी मरते जाने का

 

रिश्ते नाते देख देखकर

जो भरोसा था भी हमको

वो सब भी उठ जाता है

तोड़ने हम रिश्ते सारे

जीने को अपने सहारे

आगे बढ़ते है एक कदम

फिर बाँध ले जाती है हमको

रिश्तो की ये बेड़ियाँ

खुद ही कूदता हूँ कुएं में

खुद ही झटपटाता हूँ

आँखे फोड़ के मन की फिरसे

मैं अँधा हो जाता हूँ.

 

घर में रेगिस्तान बसा है

मन में रेत सी भर चुकी है

जी रहा हूँ साँसे है पर

आत्मा तो मर चुकी है..

कर्मभूमि

-santosh kumar

 

राजेश अपनी उम्र के युवको की भाँति ही निरुद्देश्य सा था. बीटेक  किया फिर एमबीए और अब यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. पर उसको पता था की उसका मन कहीं नही लगने वाला. उसके पापा आर्मी मे मेजर थे इसलिए राजेश फौज के तौर तरीक़ो से सर्वथा परिचित था. पर फौज से उसे कोई लगाव हो ऐसा नही था. उल्टा फ़ौजियो की शराब पीने की आदत उसको उनसे  दूर ले जाती थी. जब भी कोई जय जवान के नारे लगता तो उसे अजीब सा लगता. देशभक्ति सेना की मोहताज हो, वो ऐसा नहीं मानता था. सच तो ये था कि उसने अपने आसपास के फ़ौजियो मे रत्ती भर देशभक्ति नही देखी थी. अपने पापा मे भी नही. वो सोचता था- “काश लोगों को देशभक्ति का अर्थ मालूम होता”.

दो बार यूपीएससी दिया पर दोनो बार असफल. एक तरफ उम्र निकली जा रही थी, अब अगले साल 25साल का हो जायगा और फौज मे 25 के बाद ऑफिसर्स की भर्ती नही होती. एक धुंधली सी आशा देखकर राजेश के पिता ने आग्रह किया की इस बार यूपीएससी के साथ सीडीएस  की भी परीक्षा दे दे. राजेश ने भी पिता की बात का मान रखा. उसने दोनो परीक्षाओ की तैयारी की परंतु दिल ही दिल मे ये प्रार्थना की कि उसका यूपीएससी प्रीलिम्स क्लियर हो जाए. सीडीएस  मे वो जाना  तो नही चाहता था लेकिन फिर  भी इस डर से पढ़ा कि अगर कम अंक आए तो पिता को दुख होगा. रिज़ल्ट आया और तीसरी बार  भी वो यूपीएससी मे नाकाम रहा. पर साथ ही वो सीडीएस  की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया.  पिता के चेहरे का रौब देखते ही बनता था. राजेश ने भी पिता की लाज रखते हुए सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण की. सेना को ही अपना भविष्य मान कर शिरोधार्य किया.

ये राजेश के लिए नयी चीज़ थी, पर उसे ये आशा थी कि बीटेक एमबीए की तरह  वो ये भी कर लेगा. और उसने किया भी और साबित किया की वो हर स्थिति के अनुकूल खुद को ढाल  सकता है या यूँ कहे हर फील्ड मे हाथ आजमा सकता है. पर ज़िंदगी तुक्को से नही चलती ये बात भी उसको जल्दी ही  समझ में आ गयी

शुरुआती सालो मे तो उसे आसान पोस्टिंग मिली पर चेहरे पे मूँछ और वर्दी पे स्टार के साथ उसकी जिम्मेदारियां  भी बढ़ गये. एक तरफ तो शादी हुई परिवार भी हुआ. पहले पहले तो पत्नी भी राजेश के साथ जाती थी हर पोस्टिंग पर लेकिन इस बार उसकी पोस्टिंग संवेदनशील इलाको में हुई तो पत्नी और बच्चो ने राजेश के पिता के घर में ही रहने का फैसला किया. उधर बॉर्डर से लगे सेक्टर्स का नेतृत्व जब उसे दिया गया तो शायद उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसका काम उसकी सोच से कहीं बढ़कर है. कई बार दुश्मनों से भी अधिक मुश्किलें आपके अपने लोग खड़े कर देते है.

एक  रात को अपने डायरी के पन्नो को भरते हुए उसका ध्यान गोलियों की तड़तड़ाहट से भंग होता है

हड़बड़ाकर उठता है, देखता है दोनो तरफ से गोलीबारी हो रही थी. उस वक़्त उनको रोकने का अर्थ था अपने सैनिको की जान खोना. उसने तुरंत सैनिको को दूर दूर छितर जाने का आदेश दिया पर ऑर्डर काफ़ी देर से आया. जब तक संकट हटा काफ़ी गोलियाँ चल चुकी थी. रात को गश्त लगाई गयी तो पता चला की आस पास के इलाक़ो मे दो आदमी मारे गये. कुछ घरो की दीवारे छलनी हो गयी थी. आम लोगो में दहशत का माहौल था. कुछ पड़ोसी देश को कोस रहे थे, कुछ सरकार को और कुछ अपनी किस्मत को.

“मुझे बताओ कल क्या हुआ था?” सुबह सुबह राजेश ने सबकी परेड लगाई. गरजकर पूछा “तुम्हे शूट करने का ऑर्डर किसने दिया? गिव मी एन आंसर damn it”

पड़ोसी देश ने हमला किया सर. हम तो चुपचाप खा रहे थे

और पी भी रहे थे. क्यूँ है या नही?

सबके कंधे लटक गये

सच सच बताओ पहले गोली किसने चलाई?

सर बताया तो. उन्होने चलाई. अभी तक तो प्रेस मे भी आ गयी होगी.

प्रेस में वही बात जाती है आर्मी के बारे मे जो हम बताना चाहते है. मैं सच जानना चाहता हूँ

हम अपने बयान पे कायम है सर. गोली उन्होने चलाई

अच्छा अगर पहली गोली उन्होंने चलायी तो तुमने किसकी परमिशन से गोली चलायी.  मुझसे बिना पूछे गोली कैसे चली?

सर सब इतनी जल्दी में हुआ कि रियेक्ट करने का समय नहीं था.

इस जवाब से न राजेश संतुष्ट था न बड़े अफसर. उन्हें इससे साज़िश की बू आ रही थी. इन्क्वायरी समिति बैठी. मामला गंभीर था. यद्यपि राजेश का इस प्रकरण में कोई हाथ नहीं था तथापि लापरवाही और नेतृत्व की असफलता को लेकर उसकी खूब भर्त्सना हुई और उसे भी वार्निंग दी गयी. राजेश इसे अपनी व्यतिगत पराजय मान रहा था. रह रह कर यही बात मन में आ रही थी कि वो सेना के लिए उपयुक्त नहीं है.

मीडिया में  रिपोर्ट गयी की पड़ोसी देश ने पहले गोली चलाई और इंडियन आर्मी ने जवाबी कार्यवाही की. पर इस रिपोर्ट पर खुद राजेश को विश्वास नही था. खैर बात आई गयी हो गयी.

 

कुछ महीनो बाद फिर गोलीबारी हुई. पर इस बार गोलीबारी बाहर नही अंदर हुई. एक सिपाही ने दूसरे सिपाही को गोलियो से भून दिया. सिपाही शराब के नशे मे धुत था पर गोलियों की आवाज़ से उसका नशा टूटा. सामने जो देखा तो विश्वास नही हुआ कि ये उसी का किया धरा है. हाथ से बंदूक छूट गयी. उसे पकड़ के लाया गया

राजेश ने उसे बंदूक के बट से मारा. यूँ तो सिपाही राजेश से बलिष्ठ था पर अपराध बोध के  के कारण उसने प्रतिकार नही किया

क्यूँ किया?

कोई जवाब नही

मुझे जवाब दो

पर कोई आवाज़ नही

कोई मुझे ये बताएगा  यहाँ क्या हुआ?

एक सिपाही आगे हुआ.

सर एक पुरानी बात पर  झगड़ा हो गया

कौनसी बात?

दोनो खूब पिए हुए थे. ये जो मरा है इसने नशे मे ताना मारा- “तूने ग़लत किया उस दिन बॉर्डर पे गोली चलाके”. उस दिन भी ये पिया हुआ था, दोनों तरफ से गालियाँ बाकि जा रही थी, लेकिन ये कुछ ज्यादा तैश में आ गयाऔर….. गोली चला दी

तो मैं सही था. अब समझ नही आता इसे किस बात की सज़ा दूं उस दिन की या आज की

गर्दन झुकाए सिपाही बोला- “आज जो किया है चाहो तो सर फाँसी चढ़ा दो कोई गुरेज़ नही. पर उस दिन जो हमने किया सही किया”.

सही किया?!! तुम्हारे कारण हमारे सिपाही मारे गए  दो सिविलियन मरे, हमारी बदनामी हुई…. क्या अच्छा किया?

देश का दुश्मन हमारा दुश्मन सर उनके साथ कोई हमदर्दी नही. मेरा बस चले तो एक एक को भून डालूं

तुम्हे यहाँ किस लिए रखा है सुरक्षा के लिए या हिंसा के लिए ?

आपको किनसे हमदर्दी है सर उनसे या हमसे?

क्या कहा!! गेट लॉस्ट फ्रॉम हियर. इसे हाउस अरेस्ट मे रखो. सुबह इसपर डिपार्टमेंटल एक्षन लिया जायगा

यस सर

और एक और बात…. वो बॉर्डर वाली बात…. किसी के सामने नही आनी चाहिए.  देश की बदनामी होगी.

आज राजेश को समझ नही आया की उससे क्या चूक हुई. उसको एहसास हुआ कि वो ज़िन्दगी के इम्तिहान में भी फेल हो गया. रह रह कर बातें याद आने लगी.   “मेरे होते हुए ऐसा कैसे… हाँ शायद एक बीटेक और एमबीए वाला दिमाग़ लोगो को नही संभाल सकता. तभी तो यूपीएससी में कभी निकल नही पाया. पापा के कारण मैने आर्मी ज्वाइन तो कर ली  पर शायद इस काम के लिए मैं नही बना. आई डोंट डिज़र्व दिस प्लेस. आई डोंट डिज़र्व एनीथिंग!!  अंदर से एक आवाज़ ये ज़रूर आई कि “भूल जा, ज़िन्दगी में ऐसे मौके आते रहते है, आज इतने सालो बाद ये कैसी बात लेकर बैठ गया ” पर उसपर नेगेटिविटी इतनी हावी हो गयी थी की उससे कुछ समझदारी की आशा बेकार थी.

रात के अंधेरे मे गश्त लगाने के बहाने बाहर निकला. बॉर्डर पर खड़े सिपाहियो को अचरज ज़रूर हुई पर कोई कुछ कह नही पाया. बॉर्डर के किनारे एक पहाड़ी रास्ता था. वहाँ से जाया जा सकता है. पर कहाँ. एक तरफ पड़ोसी देश का बॉर्डर  दूसरी तरफ सहमे दबे डरे लोग. कहीं भी तो जाया  नही जा सकता. जितना भी दूर जाऊ अँधेरा दूर नहीं होगा.

हां छुट्टी की दरख़्वास्त दी जा सकती है,पर अभी ऐसी घटना के बाद बहुत तनाव होगा ऐसे मे उसकी छुट्टियाँ मिलना मुश्किल है. राजेश का जी खट्टा हो गया. अब हर दिन बोझ था,  जैसे भार डाल दिया हो किसी ना और ढोने को कोई और कंधा ना बचा हो.

कई महीनो बाद आख़िर छुट्टी की अर्ज़ी मंजूर हो गयी.  दो महीने का अवकाश. लेकिन राजेश का मन घर जाने का नही था. जी तो चाहता था कहीं ऐसी जगह चली जाऊ कि लौट के यहाँ ना आना पड़े. घर का टिकट कटाया ज़रूर  पर घर पहुँचा नही. न ही वापस अपने पोस्ट पर रिपोर्ट की.  सबको लगा कही बीच मे फंस गये. उन दिन कुछ इलाक़ो मे भूस्खलन आया था वही कहीं फंसे  होगे. बहुत खोजा पर नही मिले. संपर्क का कोई साधन नहीं. फ़ोन, पर्स बैग सब बीच रास्ते छोड़ आया था. फ़ोन मिला पर्स मिला सामन मिला पर राजेश का कहीं अता पता नहीं लगा.

कई महीने बीत गये. फौज के अधिकारीयों  ने राजेश को भगोड़ा और देशद्रोही घोषित किया. उसे गुमनाम या शहीद भी माना जा सकता था बर्शते उसके होते हुए सिपाहियो का कांड ना हुआ होता. इस घटनाक्रम से उसकी बहुत किरकिरी हुई. उसकी भूमिका पर इंक्वाइरी भी बैठी थी पर कोई सबूत ना मिला. उसके भाग जाने से सबकी उँगलियाँ उसपर उठ गयी. मामले का सारा ठीकरा उसके ही सर पर फूटा.

 

*****

 कई साल बीत गये और किसी अनजाने गाँव में एकांत वास करते हुए बाबा को अब एहसास हो गया था की वो इतने सालो से ग़लत ही सोचता था. एक पल के अंधकार ने उसको कितने सालो तक अँधा कर रखा था. वो पूरे गांव को या यूँ कहे पूरे इलाके को बिना कोई हुकुम दिए बिना किसी सख्ती के संभाल  सकता है. जाने उस रात को वो नामुराद ख़याल कहाँ से आया.

“आज हमारी ख्याति कई गाँव मे फैल गयी है. पर क्या करे उस ख्याति का जब परिवार ही साथ नही. कोई अपना पास नही”. वो जानता था सरकार उसे दगाबाज़ और  देशद्रोही समझती है

तभी उनका एक अनुयायी उसका चिंतन भंग करता  है

बाबा शहर से कोई मिलने आए है आपसे

कौन है?

आपका आशीष लेने आए है

आने दो

“बाबा जी!” बाबा उठ कर देखते है और देखते ही उनकी आँखे भीग जाती है. सामने उसके पिता खड़े है. और साथ मे उसकी अपनी पत्नी!! यद्यपि घनी दाढ़ी के आवरण और साधू की वेशभूषा में उसे पहचानना बहुत मुश्किल था तथापि शर्म के मारे आधे चेहरे को चादर से ढक दिया.

“बाबा कई साल हो गये, मेरा बेटा गायब हुआ और फिर नही आया….पता नहीं जिंदा भी या नहीं”

एक पल तो बाबा को धक्का लगा . दिल तो चीख चीख कर कह रहा था कि मैं जिंदा हूँ. किसी तरह आँखों को भीगने और शब्दों को फूटने से रोका. शांतचित्त होकर बोले-“तो अपने बेटे को ढूँढ रहे हो. चिंता मत करो, तुम्हारा बेटा जिंदा है. एक पल के असंयम ने उसे अपने जीवन पथ से भटका दिया था पर जल्द ही वो लौटेगा तुम्हारे पास, धीरज रखो”

 

नही बाबा जी मैं जनता हूँ वो हमे याद करता होगा…. पर इतने साल मे इतना इंतज़ार किया की अब आशा ही खो दिया…. इसलिए…….

 

बाबा फिर बोले- “आशा कभी ना छोडना. तुम्हारा बेटा जल्द ही वापस आएगा”

 

“अब आकर भी क्या करेगा. जितना सहना था हमको सह लिया. बाबा जी  बहू की दूसरी शादी कराई. ये तो तैयार नही थी पर अब जा कर मानी है. पीछे खड़े युवक को इशारा करता है. “इनको आशीर्वाद दीजिए”.

 

बाबा देखते रहे बस देखते रहे और कोसते रहे उस दिन को मन ही मन. सोचा अभी चोगा उतार के बोलूं कि मैं आपका बेटा राजेश हूँ . पर कह नही पाया. उसने अपनी कर्मभूमि के साथ छल किया था, आज ज़िन्दगी उस छल का प्रतिकार ले रही थी.

अपनी ही पत्नी के सर पर हाथ रखके बोला “सौभाग्यवती भव:” पर आज ये आशीर्वाद उसके लिए नही था

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  लीडर

 -santosh kumar

 

सूरज अभी तक उगा नही था. भोर का समय था. कडकडाती ठंड मे सब बिस्तर मे मुंह ढके  सोए पड़े थे. पर उस ठंड में भी  एक कोने पर चाय की ठेली  लगा कर बैठा था एक दुकानदार. और ग्राहक कौन- रात के समय काम करते मजदूर. पर उनके अलावा एक नायाब ग्राहक रोज़ आते थे चाय पीने. प्रकाश. कभी आर्मी मे थे अब सेना के प्रशासनिक विभाग मे भेज दिया गया था. रोज़ सुबह उल्लू की तरह जाग जाते. और दो स्वेटर एक के उपर एक डालकर बाहर आ जाते.

 

चाय वाला: “साहब आप इतनी सुबह सुबह उठ कैसे जाते हो?”

प्रकाश: “जैसे तुम उठते हो”

चाय वाला: “हमारी तो रोज़ी रोटी का सवाल है. आप तो अफसर  है. आपको क्या ज़रूरत है?”

प्रकाश: “मुझे इनसॉमनिया है”

चाय वाला: “क्या?”

प्रकाश: “मतलब मुझे नींद ना आने की बीमारी है”

चाय वाला: “आपका कोई घर परिवार भी है हुज़ूर”

प्रकाश: “नही, कोई नही है. अपनी उम्र तो जोश और जुनून मे बिता दी, लीडर के भरोसे. अब जब जवानी ढल गयी है और लीडर भी नही रहे तो बड़ा सूना सूना लगता है”

चाय वाला: “लीडर को हुआ क्या?”

प्रकाश: “कौन जाने. कोई कहते है मर गये कोई कहते है ज़िंदा है”

 

“मेरा दिल कहता है वो ज़िंदा है”- पीछे से एक आवाज़ आती है. घनी दाढ़ी वाले और मैला सा चोगा पहने एक बुजुर्ग दिखाई पड़ते  है

“आपकी तारीफ?” प्रकाश ने कुछ नाराज़गी से पूछा

“बाबा जी बैठो”  चाय  वाला कहता है. “बड़े सिद्ध बाबा है. अभी कुछ दिन पहले ही पधारे है हमारे यहाँ”

 

“आप लीडर के बारे मे कुछ जानते भी है?” प्रकाश ने बेरूख़ी से पूछा

 

“वैसे तो कुछ नही जनता. नाम बहुत सुना है, पर कभी मिला नही. जब हमारी उम्र थी तो बहुत ख्याति थी उनकी. अपना दिल नही मानता की वो अब नही रहे”

 

“सच है. मानने का जी तो नही चाहता पर…. एरोप्लेन क्रैश  के बारे मे तो सब जानते है”

 

चाय वाले ने कहा- “कुछ बताइए ना उनके बारे मे. क्या क्या हुआ उनके साथ. उनकी बात, अपनी बात”

 

“ठीक है, एक और चाय बनाओ फिर”

जी हुज़ूर कहता हुआ चाय वाला चाय बनाने लगता है और साथ ही साथ प्रकाश की बात भी सुनने लगता है. बुजुर्ग बाबा भी शांत चित्त से टकटकी लगाये प्रकाश को देख रहे थे.

 

“ लीडर, उनकी शख्सियत ही कुछ और थी, सब से अलग थे. लाखों की भीड़ में भी अलग नज़र आते थे. उनके साथ मुलाकात तब हुई जब वो पॉलिटिक्स मे आए. तब तक हमे बस ये पता था कि  वो आई ए. एस अफसर  थे कभी,  पर उनके हर काम में मंत्री लोगों का टांग अडाना उन्हें अखरता था. बेवजह की चापलूसी वाली नौकरी उन्हें नही सुहाई, ज़्यादा पावर की चाह थी तो पॉलिटिक्स मे आ गये. दिमाग़ से बहुत तेज़ था और प्रैक्टिकल आदमी थे और प्रखर वक्ता भी,  तो जल्दी ही एक बड़ी पोलिटिकल पार्टी मे जगह बना ली

उनकी पार्टी प्रमुख विरोधी दल की भूमिका में थी,  तो जायज़ सी बात थी सत्ता दल के काम की आलोचना करना उनका परम उद्देश्य था. वो समय ही ऐसा था. हर जगह उथल पुथल थी. मैं उस टाइम कॉलेज मे पढ़ता था. स्टूडेंट यूनियन का मेंबर भी था. लीडर की पर्सनॅलिटी ग़ज़ब की थी. भाषण देते थे तो लगता था की अगर खून भी माँग ले तो वो भी न्योछावर कर दे. हमने कई बार उनके साथ हड़ताले की, रैलियों मे भाग लिया. तब एक बार एक पोलिटिकल मीटिंग मे प्रत्यक्ष संवाद हुआ. फिर जो साथ बना वो कभी टूटा नही

उन्होने ही मुझको कहा था कि उनकी दिल की तमन्ना थी कि  फौज मे जाकर देश की सेवा करे. पर रिस्की प्रोफेशन था तो परिवार ने मना किया. बोला अगर देश की सेवा करनी हो सिविल सर्विस दे दे. वो उसे अपनी सबसे बड़ी भूल मानते थे. उनके विचार अलग भी थे और खतरनाक भी. वो कहा करते थे- “इस देश को ज़रूरत है रेवोल्यूशन की ,आर्म्ड रेवोल्यूशन की”.

उनकी इस बात का मुझपर गहरा असर हुआ. कुछ महीनो मे सी. डी. एस में चयन हो गया. ट्रैनिंग लेकर अफसर बना. इन कुछ सालो मे लेटर्स और फोन के ज़रिए संपर्क  मे रहे. पता चला चुनाव मे लीडर की पार्टी जीत गयी है. सुनकर बहुत खुशी मिली कि चलो अब  देश का भला होगा.

पर कुछ सालो बाद जब उनसे मुलाकात हुई तो उनको अप्रसन्न ही पाया

मुझसे कहा- “पहले विरोधियो से लड़ रहे थे अब अपने आदमियो से लड़ रहा हूँ. पार्टी का अध्यक्ष अपनी चलाता है और पार्टी वाले लोग- वो तो उस सोशियल वर्कर के अंध भक्त बने हुए है. कहता है मैं किसी पार्टी का नही सबका भला चाहता हूँ और यही कह कह कर वो पार्टी मे फूट डाल  रहा है”

याद है मुझे. वो सोशियल वर्कर एक समय बैरिस्टर थे विदेश मे.  कई साल वकालत करके भारत लौट आये.पिछले एक दशक से राष्ट्र नेता बनकर उभरे थे. पर लीडर और उनकी कभी नही बनी

लीडर कहते थे मुझसे-  “ये राष्ट्र नेता चाहता है कि हम दुश्मन का प्रतिकार ना करे. ये लोग देश के विद्रोहियो को दुश्मन मानते है पर बाहर के दुश्मनो को दोस्त. इनका बस चले तो आतंकवादियो से भी सुलह कर ले”.

ये थोड़ी अतिशयोक्ति थी.  राष्ट्र नेता शांति के दूत थे और लीडर को मिलिटरी से प्यार था.  विचारधारा की लड़ाई कब दिलो में घर कर जाती है ये पता  ही नहीं चलता.

“मेरी पोस्टिंग लीडर से दूर हुई तो कुछ समय  तक उनसे दूरी रही. बस ये खबर आती रही की लीडर अपनी पार्टी से अलग थलग पड़  रहे है. पर समस्या कितनी गहरी है इसका अंदाज़ा हमे बाद मे ही लगा.

हमारे कुछ सिपाही सरहद पार की फाइरिंग मे मारे गये थे. जनता मे आक्रोश था. उपर से मीडिया का रोल. आग में घी नहीं घी में आग डालते है ये तो.

एक दिन अचानक से फोन आया. फोन पे लीडर थे. बोला मैं तुम्हारे शहर मे हूँ. तुमसे मिलना चाहता हूँ जल्द से जल्द.

वैसे तो कैंट एरिया से बाहर जाने मे कई तरह की झंझट है पर लीडर से मिलने की ख्वाहिश ऐसी थी की मैने परवाह नही की.

तय वक़्त मे तय जगह पहुंचा  तो लीडर मेरा इंतज़ार कर रहे थे

लीडर: “तुम्हारी हेल्प चाहिए प्रकाश”

प्रकाश: “जान हाज़िर है लीडर”

लीडर:“हाँ समझ लो, वही चाहिए. देश पर हमले  हो रहे है. कब तक चुपचाप बैठोगे?”

प्रकाश: “पर लीडर फाइरिंग दोनो तरफ से हो रही है”

लीडर: “शुरू कौन कर रहा है?”

प्रकाश: “इस सवाल का तो कोई जवाब नही है.”

लीडर: “ये लोग देश को बांटने  के बारे मे सोच रहे है”

प्रकाश: “कितने टुकड़े करेंगे और? वैसी ही दो देश बन गये हमारे देश से?”

लीडर: “जब तक इनकी सत्ता की भूख रहेगी. देश तब तक बंटता रहेगा. हमें  रोकना पड़ेगा इसे”

प्रकाश: कैसे लीडर?

लीडर: प्रकाश वी नीड अवर ओन आर्मी.अ  गौरिल्ला  आर्मी

प्रकाश: ये देश के साथ धोखा नही होगा लीडर

लीडर: नही बिलकुल नहीं. हम तो  देश को बचाने के लिए के लिए लड़ रहे है.

प्रकाश: अपनी सरकार के खिलाफ?

लीडर: नही रेबेल फोर्सस के खिलाफ. सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ और देश के दुश्मनों के खिलाफ

मुझे ये काम कुछ सही नही लगा पर लीडर का विश्वास देखकर मुझे लगा कि मुझे ये काम करना चाहिए. अगर सही रहा तो देश की सेवा हार भी गये तो लीडर की सेवा

 

मैने एक सीक्रेट मीटिंग बुलाई,  केवल उन लोगो की जो हमारे काम आ सकते थे. कुछ लोग मान गये. और जो नही माने उनसे ये वचन ले लिया की वो किसी से कुछ नही कहेंगे. तय हुआ कि  सब कुछ कुछ दिन के अंतराल मे छुट्टी लेंगे ताकि सहूलियत हो और शक भी ना हो. जब हमारी फोर्स जमा हुई तो पता चला की लीडर ने गांव गांव जाकर भारी संख्या मे लोगो को जमा कर लिया था.

“लोग हमारे पास काफ़ी है. हथियार और रसद आ जयगी कल तक. अभी के लिए पैसा भी है पर हमारी लड़ाई लंबी है. इतने से कुछ नही होगा. हमे सबका सहयोग और सबसे सहयोग चाहिए. लेकिन एक चीज़ जो हमारे पास नही हैं वो है सपोर्ट. हमे किसी ऐसी एजेन्सी किसी ऐसे ग्रूप का सपोर्ट चाहिए जो हमे पावर भी दे और हमारे अस्तित्व को स्वीकृति भी”. ये कहकर लीडर ने हुंकार भरी ‘वन्दे मातरम’ की जिससे पूरा आसमान गूँज उठा.

पर मैने जब लीडर की आर्मी ज्वाइन  की थी तो मैं नही जानता था की लड़ाई कितनी लंबी होगी. हमने जो किया वो आर्मी और देश दोनो के उसूलों के खिलाफ था. इतने सारे सैनिको और अफसरों के अचानक छुट्टी पर चले जाने से शायद सरकार को भी भनक लग गयी थी कि कुछ गड़बड़ है. इस दौरान हमने कई गॉरिला वारफेयर  के कैंप्स लगाए. हमारा लक्ष्य था कि बॉर्डर पे तैनात सिपाहियो की मदद से दुश्मनो के ख़ुफ़िया ठिकानो का पता लगाया जाए. कुछ अफसरों  से बात हुई जो चोरी छुपे हमे सपोर्ट देने को तैयार थे. पर ऐन टाइम पर वो लोग दगा दे गये. सही समय पर सप्लाई और सही इनफार्मेशन न मिलने से हमारी लड़ाई अंजाम पर पहुँचने से पहले ही थम गयी. हमारे कई लोग मारे गये, कई लोग पकड़े गये. मैं लीडर और कुछ गिने चुने लोग भेष बदल के भाग निकले. लीडर ने डिसाइड किया की अब देश मे रहना ठीक नही. लीडर देश छोड़  के चले गये और हम बिना किसी सहारे के, छुट्टियाँ ख़त्म होने से पहले ही रेजिमेंट लौट आये.

सरकार को हम पर शक था पर शायद वो सब लीडर से वाकिफ थे इसलिए निष्कासन न होकर समझौता हुआ. हम लोगों को सतही कारवाही के बाद वापस सेना में ले लिया गया.कुछ महीनो बाद ये खबर आई की लीडर का प्लेन क्रैश हो गया और उनकी मृत्यु  हो गयी. हमारे अंदर का सारा जोश सारा जुनून मर गया. मैने सिर्फ़ लीडर ही नही अपना गुरु अपना दोस्त खोया था.

 

बोलते बोलते प्रकाश  की आँखे भर आई.

“तुम्हारी कहानी अधूरी है”- बाबा अचानक बोल पड़े

“क्या?”

“मैने कहा तुमने पूरी कहानी नही सुनाई”

“तो पूरी कहानी क्या बाबा”- चाय वाले ने चमत्कार की आशा से पूछा.

बाबा ने एक नज़र प्रकाश को देखा, फिर बोले- “लीडर कभी मरा नही. उसे सरकार के कहने पर विदेश मे ही नज़रबंद कर दिया गया.”

लीडर के साथ के सभी लोगो को आर्मी मे भरती कर लिया गया. लेकिन एक शर्त के साथ

“कैसी शर्त?” चाय वाले ने पूछा

“सभी ठिकानो, हथियारो और पैसे का पता, और दूसरा लीडर की मौत की झूठी कहानी गढ़ने की. प्लेन का क्रैश होना लीडर का मरना सब एक साजिश थी. है ना मिस्टर. प्रकाश

प्रकाश  झेंप गया. चाय वाला बोला-  “आप तो सिद्ध हो बाबा!! चमत्कार!!

प्रकाश चिल्लाया-  “कोई चमत्कार नही है ये. ए बाबा बताओ कौन हो तुम?”

बाबा सवाल का जवाब देने की बजाय गोल घूमते रहे. “विदेश से लीडर इस शर्त पर रिहा हुए कि अपनी पहचान किसी को नही बताएँगे”

इधर उधर घूमते भटकते अपने देश पहुँचे. इतने सालो मे लोग लीडर को  भूल गये थे. दबी ज़बान से अपनी मौत के किस्से भी सुने उसने. और क्या करता. ना पैसा था ना पहचान, बाबा बन गए”

अभी तक प्रशांत उनकी बात को अनसुना कर रहा था पर ये शब्द उसके कानो मे गूँज गये. अब तक सूरज निकलने लगा था. उसने गौर से देखा. घनी दाढ़ी के बीच छुपा चेहरा कुछ कुछ दिखने लगा था. लीडर- मेरे सामने. उसे विश्वास नहीं हो रहा था अपनी नज़रो पर

“जब आप किसी को अपनी पहचान नही बताते तो हमे क्यूँ बताई”

“बस एक सवाल पूछना था प्रकाश तुमसे? छोटा सा”

क्या सवाल. प्रकाश ने बोला पर उसे भीतर ही भीतर वो सवाल पता था पर शायद जवाब नही

“बाकि सबसे तो मुझे उम्मीद थी भी नहीं प्रकाश पर तुम…. क्यूँ?”

“इस क्यूँ का जवाब उसे भीतर ही भीतर काटता रहा है. और सच बात तो ये है कि उसके पास इस क्यूँ का कोई जवाब नहीं था. कहना तो चाहता था कि “मैं मजबूर था, आप तो विदेश चले गए मैं कहाँ जाता. शायद लीडर ने मुझे सिर्फ और सिर्फ  अपने अनुयायी के रूप में देखना शुरू कर दिया था, शायद इसलिए शायद कभी मेरी राय को न सुना, न समझा न माना”.

“आखिर में मैं कुछ भी नहीं कर पाया. न देश की सेवा न लीडर की सेवा. बिना किसी मकसद के मैंने दो दो विश्वासघात किये है. कहने को बहुत कुछ है- शिकायते, बहाने, तर्क, भावनाएं . पर कुछ कहने को जी नहीं चाहता”.

जब सामने से कोई जवाब नहीं आया तो बाबा उठ के जाने लगे. जाते जाते जूलियस सीज़र की ब्रूटस को कही गयी बात कह गए

“you  too brutus?”

और प्रकाश से कोई जवाब देते ना बना

 

 

 आइस्क्रीम

-संतोष कुमार

 

वो 22-23 साल का युवक था,ज़्यादा नही बोलता था. अपना काम करता और आइस्क्रीम वैगन पर ताला जड़ कर कहीं  निकल जाता. उसके आसपास के दुकानदार भी नही जानते थे उसका नाम पता कुछ, ना उसने कभी कुछ बताया. शायद बताने को कुछ नही था… या शायद बहुत कुछ.

टेंट की चिथड़ो मे अपना बसेरा बनाए हुए वो युवक खा पी के बैठ जाता था रोज़ और अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचा करता था या रात के आसमान में मानो अपने किस्मत के सितारे खोजता था. पर आज उसे कुछ याद आ रहा है. कई साल हो गये आइस्क्रीम बेचते हुए, पर आज तक खुद आइस्क्रीम चख के नही देखी. जाने ऐसा क्या स्वाद है इसका, दिन ख़त्म होने से पहले ही सारी आइस्क्रीम बिक जाती है. ऐसा क्या है इस आइस्क्रीम मे. बर्फ मे रंगीन पानी या दूध और चीनी. ऐसा क्या है इसमे कि उसने अपनी आख़िरी इच्छा मे आइस्क्रीम माँगी!!

और एकाएक उसे अपनी बहन याद आ गयी.

दस साल पहले टेंट भी वैसा ही था ग़रीबी भी कुछ वैसी ही थी, हाँ पहले हालत ज़रा और बदतर थी. माँ बाप नहीं थे  पर हां बहन थी और उसके लिए जीना जीने का मक़सद था. हर तरह के काम किए- सड़क पर भीख माँगी, फूल, कॉपी, किताब बेचीं. उन्ही दिन बहन ने पहली बार आइस्क्रीम देखी और बाकियों को खाते देख के दिल ललचा गया उसका. पर पैसे नही थे. जहाँ खाने को रोटी नसीब ना हो वहाँ आइस्क्रीम किसी लक्ज़री से कम तो नही. ऐसा नहीं था कि  वो आइसक्रीम खिला नहीं सकता था. पर पैसा ऐसी चीज़ पर खर्च करना कहाँ की होशियारी है जिससे पेट ही नहीं भरता, वो भी तब जब कई कई दिन भूखे सोना पड़ता हो. दिल के एक कोने में शायद अभी भी ये विश्वास जिंदा था कि पैसे बचाकर ज़िन्दगी संवारी जा सकती है. आइसक्रीम खाकर एक पल की ख़ुशी तो मिलेगी पर पाई पाई जोड़ जोड़ के जो गुजर बसर हो रहा है उस पर आंच नहीं आनी  चाहिए.

बहन ने बहुत ज़िद की कि भैया ये खिलाओ ना. एक दो बार दुकानदार से पूछा भी, पर उनकी सूरत देखकर कुछ तो  दुकानदारो ने भाव नही दिया और कभी- कभी तो हाथ जेब मे जाते जाते रुक गये. अगर ये पैसे भी दे दिए तो रात को खाएँगे क्या. बोला करता था- “एक दिन आइसक्रीम की दुकान खोलूँगा, फिर पूरे दिन आइसक्रीम खाना”. आज आइसक्रीम तो है, पर बहन नहीं है.

उसे याद आता है वो दिन जब उसे  रास्ते मे पर्स गिरा हुआ मिला. देखा पैसो से भरा पड़ा है. एक पल को लगा- अब तो जीवन भर खुशी से काट सकते है, अब भूखे नही सोना पड़ेगा और हां- “बहन को आइस्क्रीम खिलाऊंगा”

तभी एक शोर से उसका ध्यान भंग हुआ. जिसका पर्स खोया था शायद उसे देर से एहसास हुआ था की उसकी जेब में उसका पर्स नहीं  है. फैमिली के साथ आइस्क्रीम खा रहे थे शायद, पर जब एहसास हुआ कि जेब में पर्स नहीं है तो आइसक्रीम का सारा मज़ा किरकिरा हो गया.

एक अजीब सी स्थिति थी- पर्स दे या नही. पर इतने उदास चेहरे उससे देखे नही गये. जाकर बोला- “आपका पर्स”. पहले तो उन्हे लगा कि  चोर है, कुछ देर शक भरी निगाहों से उसे घूरते रहे. फिर सोचा कि अगर चोर होता तो इतनी विनम्रता से पर्स वापस क्यूँ करता और वो भी पूरे पैसो के साथ!!  उन्होने पूछा- “कहाँ मिला?”

“यहाँ सड़क के किनारे गिरा पड़ा था”.

पर्स के मालिक ने कुछ पैसे लड़के को देने चाहे पर लड़के ने विनम्रता से मना कर दिया. परिवार वाले तो चले गए. हाँ पर्स का मालिक जाते जाते आइस्क्रीम वाले  को एक्सट्रा पैसे देते हुए बोला- “इस लड़के को भी एक आइस्क्रीम दे देना”.

लड़के के चेहरे मे चमक आ गयी. उसकी बहन का सपना पूरा हो जायगा आज! आज वो आइस्क्रीम खाएगी!

दुकानदार ने नारंगी पानी चढ़ी हुई बर्फ की डंडी दी. आज उसने पहली बार आइस्क्रीम हाथ में पकड़कर देखी थी. और उसका दुर्भाग्य तो देखो, बहन की तबीयत कई दिन से नासाज़ थी. वो घर पर ही थी. लड़के ने मन ही मन सोचा- “तो क्या हुआ  आइस्क्रीम घर लेकर जाऊंगा अपनी बहन के पास”.

कड़ी धूप थी पर वो दौड़ता हुआ गया. गर्मी थी, थकान थी, ट्रैफिक ने भी रास्ता रोका पर वो रुका नही. पर आइस्क्रीम के बारे मे शायद एक बात उसे पता नही थी- ‘ये पिघल जाती है’. वो घर पहुँचा पर तब तक हाथ मे सिर्फ़ डंडी थी और पूरे हाथ मे टपकता चिपचिपा रस. उसे आज भी याद है उसकी बहन कितना रोई थी. उस दिन उसने ज़िंदगी की नयी बात सीखी थी जो उसकी आइस्क्रीम के डब्बे मे रंगीन अक्षरो मे आज भी लिखी हुई थी.

“ज़िंदगी आइस्क्रीम की तरह है, जल्दी से खा लो वरना पिघल जायेगी !!”

बहन का बुखार जाने क्यूँ उतार नही रहा था. जाने क्या रोग था जो ठीक ही नही होता था. शरीर कमजोर होता जा रहा था. पहले  भूख से बिलबिलाया करती थी, पर  अब भूख  मर सी गयी थी उसकी. पर वो क्या कर सकता था. डॉक्टर छोड़ो हकीम को देने के भी पैसे नही थे. सरकारी अस्पताल में जाते, पर भिखारी समझ के चौकीदार गेट से खदेड़ देता. अब हाल कुछ ऐसा था कि बोलने चलने में भी असहाय हो गयी थी उसकी बहन. पहली उसकी आवाज़ गूंजा करती थी, अब तो रोने कराहने की भी आवाज़ नहीं आती. शायद वो भी अपनी ज़िन्दगी से हार मान चुकी थी.

 

पर आख़िर उसके शहद से लगते शब्द सुनाई दिए. इतने दिनों का सन्नाटा टूटा था. बहन ने हां हूँ के अलावा कुछ और बोला था. धीमे से कहा- “भैया आइस्क्रीम खानी है”

और किसी दिन वो उसकी फरमाइश को हँसी में टाल देता, पर आज नही. “मैं ज़रूर लाऊंगा”- इतना कहा अपनी बहन से. और मन ही मन बोला- “चाहे अब कुछ दिन भूखा क्यूँ ना रहना पड़े”

बहन फिर थोड़ा बोली-  “पर अगर वो फिर से पिघल गयी तो?”

ये तो उसने सोचा ही नही. पर बहन को हौसला देते हुए कहा- “नही पिघलेगी, देखना तू”

उसके पास जितने बचे कुचे पैसे थे सब लेकर चला. दुकानदार से आइस्क्रीम ली, पैसे दिए और फिर सवाल पूछा- “पिघलेगी तो नही न. दूर ले जानी है”

“दूर ले जानी है तो ये नही चलेगी. ये तो पिघल जाएगी.देख धूप कितनी कड़ी है”

लड़का मायूस हो गया. आइस्क्रीम लौटते हुए कहता है- “तो रहने दो फिर”

दुकानदार को दया आई. “दुखी होने की ज़रूरत नही. मैं तुझे दूसरी आइस्क्रीम देता हूँ. ये नही पिघलेगी”.

ये कहकर उसने अंदर से कप आइस्क्रीम निकली

“ये ले, ये नही पिघलेगी. पैसे उतने ही है”.

लड़के का दिल बाग बाग हो गया- “आज मेरी बहन को आइस्क्रीम मिलेगी”. दौड़ा दौड़ा वापस घर आया.

लेकिन अब उसकी बहन को आइस्क्रीम की कोई ज़रूरत नही रही.

आइस्क्रीम तो नही पिघली पर ज़िंदगी की आइस्क्रीम पिघल गयी.

निष्प्राण शरीर के सामने लड़का धप से बैठ गया. आइस्क्रीम को हाथ भी नही लगाया. बाद में  आइस्क्रीम को भी बहन के साथ गाड़ आया.

****

युवक स्कूल के बाहर आइस्क्रीम बेच रहा था और आते जाते बच्चो को गौर से देख रहा था. फिर उसे याद आया, बहन को गये तो 10-11 साल हो गये. अगर पुनर्जनम की बातों  में ज़रा सी भी सच्चाई होती है तो अब तक तो उसका दूसरा जन्म भी हो गया होगा ना. और शायद अब तक वो स्कूल भी जाने लगी होगी. पर पता नही, लड़का होगी या लड़की

“बस भगवान इतना करना कि इस जन्म मे उसके पास आइस्क्रीम खाने के पैसे हो…..”

 

मन ही मन ये अरदास करके वो फिर से काम मे जुट गया. एक छोटी सी लड़की अपने भाई से कहती है “भैया आइस्क्रीम खिलाओ ना….”

ये सुनते ही आइस्क्रीम वाले को फिर से अपनी बहन याद आ गयी

 

रामलीला

santosh kumar 

 

सुरेश अपना कॉस्ट्यूम चेक कर रहा था. दर्जी ने कपड़े बहुत ढीले ढाले बनाए थे. अगर स्टेज पर धोती खुल गयी तो! नामुराद टेलर!! सुरेश मन ही मन उसे गलियाँ देता है. फिर खूब सारे पिन लगाकर धोती को अटकाता है.  अब बस यही उम्मीद है कि कहीं वो स्टेज पर अति उत्साहित ना हो जाए और उसके  कपड़े उसे  धोखा न दे दे.

इतने में रमन रूम मे आता है

“हुए नहीं तैयार अभी तक. लास्ट मिनट रिहर्सल कर ले थोड़ी”

“हां तैयार हूँ. बस ये नामुराद धोती, जाने कौन से साइज़ की बना दी. जितना टाइट करो ढीली की ढीली रहती है”

“लो, और मेरी कॉस्ट्यूम इतनी टाइट बना दी कि  बड़ी मुश्किल से मुंह घुसाया है. अब पता नही निकालूँगा कैसे”

 

सुरेश ने रमन को गौर से देखा. कॉस्ट्यूम बहुत टाइट थी. पर जॅंच रही थी

“इस कॉस्ट्यूम मे सौ फीसदी रावण लग रहे हो”

रमन को समझ नही आया की इसे अपनी प्रशंसा समझे या नहीं

“तुम भी राम लग रहे हो, बस ये धोती संभाल के, कहीं ये धोती तुम्हारा राम नाम सत्य ना करा दे!”

दोनो हंसकर निकल जाते है

वहां सुरेखा रिहर्सल हॉल मे दोनो का वेट कर रही थी

“कहाँ  रह गये थे तुम दोनो? टाइम का कुछ अंदाज़ा है?”

“मेरी कोई ग़लती नही” रमन  ने चुटकी ली. “ये तो सुरेश की ही धोती….”

“अरे चुप करो क्या बोल रहे हो”- सुरेश ने उसे बीच मे ही रोक दिया

“क्यूँ क्या हुआ?”

“अरे कुछ तो लिहाज करो किसके सामने बोल रहे हो”

“सुरेखा…. इससे कैसा लिहाज. अरे एक कॉलेज मे 3 साल पढ़े फिर साथ थियेटर किया. “वी आर लाइक फॅमिली”

रमन सही कह रहा था. पर सुरेश की फैमिली  की परिभाषा मे सिर्फ़ सुरेश और सुरेखा आते थे, रमन शायद नहीं . जाने कितने सालो से सुरेश ये सपना सजाए बैठा था, पर कभी हिम्मत नही हुई बोलने की. आज उसे उम्मीद थी की शो के बाद वो अपने दिल की बात कह देगा. उसे अंदर ही अंदर डर लग रहा था, चेहरे पे शिकन साफ थी. पर उसे शो की टेंशन कहकर छुपाया जा सकता  था.

“ओ भाई कहाँ  खो गये?” रमन की  आवाज़ सुनकर सुरेश होश में आया. “चलो रिहर्सल करे”

उसे ये नाटक करने मे बहुत आनंद की अनुभूति हो रही थी. यहाँ उसे सुरेखा को अपनी पत्नी कहने का झूठा गौरव भी था और रावण को हराने से ज़्यादा उसे रमन को हराने की खुशी थी. रमन उसका दुश्मन नही था पर मन  ही मन  वो रमन  से ईर्षा करता था और सुरेखा के लिए दोनो के बीच एक छुपी सी प्रतिद्वन्दिता थी. तो रमन को हराकर  सुरेखा को जीत लेना. इस जीत के मायने ही कुछ और है. एक ही भूमि पर एक साथ दो युद्ध लडें जा रहे थे. एक शारीरिक और एक मानसिक.

 

रिहर्सल्स मे आज उसको एक अजीब सी खुशी मिल रही थी. उसकी आँखों मे चमक थी. ये चमक तभी जाती थी जब उसे अपनी धोती याद आती थी और फिर वो थोडा सजग हो जाता था.

मंच सज चुका था. सभी किरदार अपने कैरेक्टर मे थे. सिवाय सुरेश के. उसको बहुत सी चिंताए थी. एक तो ये की आज उसने सुरेखा को इतना याद किया है की उसको डर लग रहा था की कही स्टेज पर वो सीता की जगह सुरेखा ना बोल दे. और दूसरा यही की धोती ना खुल जाए!

पर दोनो मे से कुछ नही हुआ. नाटक शुरू हो गया. राम बनके जब उसने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई तो घूर कर रमन को देखा जो अन्य राजाओ के साथ आसन पर बैठा था, सुरेश मानो अपने विजय की स्वीकृति माँग रहा हो. वनवास के दृश्‍य मे सीता के पाँव के काँटे निकालते हुए उसकी आँखो से आँसू बहने लगे. और सुरेखा ने एक पल को सुरेश की और अचरज से देखा. जाने उसे क्यूँ लग रहा था की सुरेश स्क्रिप्ट से बाहर जाकर अभिनय कर रहा था. हमेशा थियेटर मे सुरेश और रमन की एक्टिंग  मे तुलना होती रही पर आज सुरेखा मान गयी की सुरेश रमन  से बेहतर अभिनय करता था. एक पल को मानो वो सुरेश की एक्टिंग पर मोहित हो गयी. सुरेश ने ये भाव पढ़ लिया सुरेखा के चेहरे पर और उसकी आँखों मे चमक आ गयी और होंठों पर  एक मंद मुस्कान.

रावण सीता को धोखा दे  कर अगवा कर लेता है. और सुरेश बैकस्टेज ये सीन देखकर खौले जा रहा था. उसका मन था स्टेज पर आकर रमन  रूपी रावण का अंत कर दे, पर किसी तरह उसने खुद पे काबू किया

यहाँ पर दिन का शो समाप्त हुआ और अगले दिन बाकी के प्रसंग का वादा हुआ

सुरेश को खुशी थी की प्ले अच्छा हुआ और उससे ज़्यादा इस बात की उसकी धोती नही खुली. स्पॉन्सेर्स ने बैकस्टेज आकर अभिनेताओ की भूरी भूरी  प्रशंसा की. पर वो सारी प्रशंसा एक तरफ और सुरेखा के शब्द एक तरफ “सुरेश यू  वर अमेज़िंग!!”  उसके कानो मे अभी तक गूँज रहे थे

नया दिन हुआ नया सीन भी. आज का दिन उसके जीवन का सबसे यादगार दिन होगा हर लिहाज से. उसने अपनी एक्टिंग  मे कभी इतनी जान नही लगाई थी. पर आज हर संकट उसे अपने जीवन का संकट नज़र आता था.

 

“हे सागर देवता हमारे और हमारी सेना को आगे जाने हेतु मार्ग प्रशस्त करे अन्यथा मैं बाण चलाकर इस सागर को मरूभूमि बना दूँगा.”  मन ही मन वो कल्पना कर रहा था कि  समाज उसके और सुरेखा के बीच मे खड़ा है और वो कह रहा है कि हट जाओ मेरे रास्ते से. कोई कास्ट क्लास रीजन रिलिजन  की दीवार हमे जुदा नही कर सकती और अगर आज ये मुझे सुरेखा से नहीं मिला सकी  तो भाड़ मे जाए ये समाज!

रावण के संवाद आज उसे अपने उपर ताने लग रहे थे. “धिक्कार है हे राम तुम पर और तुम्हारे भाई पर. नारी को पौरुष की सीमओं मे बाँध दिया तुमने. नारी का सम्मान तो तुमने कभी किया ही नही  ना शुपनखा ना ताडका ना सीता. तुम सीता को इसलिए नही बचाना  चाहते कि सीता तुमको प्रिय है अपितु  केवल इसलिए की तुम्हारे पौरुष को कोई हानि ना हो.”

 

अचानक स्टेज पर  शांति छा गयी. सुरेश को होश आया. क्या रावण ने असल मे ऐसा कुछ बोला या ये उसका भ्रम था? जो भी था सच था.

युद्ध हुआ और रावण के हर सर को  काटते हुए सुरेश को अपनी जीत नज़दीक दिखने लगी. और नाभि मे तीर लगते ही सुरेश अंदर ही अंदर ख़ुशी से  चीखा . आज  उसकी जीत हुई.

 

सीता आई तो सही, पर उसे राम को अग्नि परीक्षा देनी होगी. सुरेश कहने को उतावला हो रहा था कि नही चाहिए अग्नि परीक्षा,  तुम जैसे भी मिलो बस मिल जाओ. और दोनो के अयोध्या आकर साथ- साथ आसन पर विराजमान होते ही नाटक का अंत हुआ. परदा गिरते ही सुरेश बाथरूम की और भागा. ये धोती उससे अब और ना संभाली जाती थी

जब कपड़े बदल वो वॉशरूम से लौटा तो रमन और सुरेखा को बधाई देने वालो का ताँता लगा था. “अरे  हमने भी अच्छी एक्टिंग की हम भी तारीफ के हक़दार है” सुरेश चहकते हुए बोला. पर जो जवाब मिला उसकी सुरेश को कतई आशा नहीं थी.

 

“नही वो बात नही सुरेश.. . ये मेरे और रमन  की शादी की बधाई है. हमने कल रात को  मंदिर मे शादी कर ली. सब  इतनी जल्दी में हुआ की किसी को कुछ बता न सके” सुरेखा ने सुरेश को लड्डू देते हुए कहा.

सुरेश के सर पर पहाड़ टूट गया. रह रह के वरमाला का दृश्य याद आता था. स्टेज पे राम जीता था पर ज़िंदगी के नाटक मे रावण जीत गया. लड्डू मुंह में गया लेकिन गले से नीचे न उतरा, लड्डू मीठा था पर दिल कड़वा कर गया.

आज विचित्र रामलीला खेली गयी. राम को अपनी कला की महानता और अपने सामर्थ्य पे अभिमान था. सीता ने स्वतन्त्र होकर अपना निर्णय लिया. रावण को अपनाया और राम के मद को चूर किया. और इस तरह इस नयी रामलीला का दुखद अंत हुआ.