विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

Manto, Saadat hasan, mottled Dawn: Fifty Sketches & Stories of Partition, Delhi, 2000, Introduction pp. 1-95 & 157-164

Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

साहनी, भीष्म, अमृतसर  आ गया है

कमलेश्वर, और कितने पाकिस्तान, मुंबई, 1969

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Who was saadat Hasan Monto: A biography

वजाहत, असगर, जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ, वाणी  प्रकाशन] 2006

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Duvidha: the dilemma inside and out

-Santosh kumar

The juxtaposition of narrative and visual give new dimensions to the narrative and open up new vistas of interpretations and possibilities. Reading and watching Duvidha, a story by Vijaydan Detha immortalized on the celluloid by Mani Kaul in 1973 familiarizes us with these feelings. There are various others precedents as well as successors to the story. Reading A.K.Ramanujan’s translation of the Kannada story “the serpent lover” makes you realize the broad similarities between the two. There was a film made on the Kannada folk tale called Nagamandalam and Detha’s story was made into paheli in 2005.

If we try to analyze the narrative, it offers you very contrasting possibilities. Firstly if seen from the perspective of gender and society the story seems to be placed in a feudal patriarchal setup where women’s voice appears in hushes and silences because the norms of propriety are to be decided by her husband and more importantly by her father in law. Property and material prosperity is counterpoised with sentiments and feelings and at this conjecture we feel the need to go beyond the confines of patriarchy to view it in structural and psychoanalytical terms. And I will try here to juxtapose Ramanujan and Freud together. This story is a good representation of what he calls women’s tale, but we must be cautioned against the use of term “counter tales” because nowhere in the text is there any attempt to counter the patriarchal domain but it merely opens up avenues for women’s desires and her voice to creep in a subtle manner. Even psychoanalytically this text can be interpreted in contrasting ways. In a more conservative interpretation the text may point out the pitfalls of transgressing the norms of propriety. The act of unveiling by the women makes her vulnerable to the gaze of the ghost, which sets off the chain of events. Thus this interpretation makes the story similar to the “little red riding hood” where the girl makes herself vulnerable to the gaze of the jackal and using tropes of material pleasure (here the flower in Duvidha the fruit) and was able to encroach her space as well as her sexuality. But if the same story is seen from the perspective of the woman, then the story is very much similar to the serpent’s lover wherein the woman finds avenue for the satiation of her desires through the impostor which is exactly the case with Duvidha. In both the cases the impostor is met with a tragic end but curiously the women is not ridiculed or shunned off but rather accepted in the patriarchal domain easily.thus the text challenges, as according to Ramanujan, the norms of chastity and propriety by inverting symbols and their signification as well as the punitive measures of these transgressions. For example an impostor or a man other than her legitimate husband is seen as a potential threat to the sexuality of women and thus to the patriarchal household. But the woman accepted the ghost as her partner despite being conscious of his identity thus challenging the regulations set up by the patriarchal household

There are couple of other ways to situate and analyse the narrative. For example two hypothetical possibilities can be discerned through a careful reading of the text and the film. One, seen through the lenses of pragmatic Freudian terms, the whole story can be mere pigment of imagination of the woman. The husband never went outside his house, but his indifference was equal to his absence. The woman was easily accepted in the family because the child belonged to the same man and the not the ghost. The ghost represents the unconscious desire of the women of seeing a more loving empathetic and caring husband. Secondly seen from the perspective of the husband the story can actually deal with the existential crisis of the husband who is in dilemma regarding his two conflicting duties- that of a money minded person meant to please his overtly money minded father, and playing a more loving and empathetic companion for her wife. In that sense we can interpret that perhaps the ghost was an alter ego of the husband. Either he went for trade but came back realizing his misgivings to his wife and by giving coins to his father he earned the concessions to live his conjugal life thus balancing his material and sentimental existence. The problem arise when the wife become pregnant and that bring the sentimental facet of husband more clearly and which seems to disrupt and overshadow his material existence. This action created anxiety in the materialist patriarchal domain and the man fell into an existential crisis where one of the identities needs to be purged to maintain the hegemony of the material world. Of course these interpretation are way too abstract and we can’t cite evidence for the interpretation except for the subtle subjective clues that could be interpreted in different ways.

Coming to the film, we also need to consider the way a movie is made and the representations of the film. The very abstract film making style and monotonous dialogue delivery of the actors makes us realize that the film doesn’t make you root for actors or characters but the rich visual spectacle through its spellbinding cinematography makes the film focus on the cultural context and tries to use these visuals as a text in itself. The still photographs are meant to be gazed and interpreted, the excessive use of contrasting lights and shades may be symbolical of different shades of human existence. The movie apart from a narrative is also a visual archive, the most visible example of which is the scene where the whole cycle of time when ghost and woman were together, was represented through a panorama of visual imagery without uttering a single word in those 5-10 minutes. But even then the film is more honest to the original story as compared to Paheli. Now we can see a change in attitude in those 30-40 years between the two. Paheli’s climax gives a subtle hint that the woman is met with the ghost again and not her husband which actually points out women’s choice winning over the patriarchal confines but in Duvidha the victory of the women lie in her ability to re assimilate in the patriarchal family even after her relation to the impostor. Duvidha raise question but as most of the parallel cinema of this time leaves the answer for viewer’s discretion. Paheli in answering the question creates an anachronism by juxtaposing traditionalism and modernity. Also Paheli gives in some detail the mention of the family of the man, which is completely absent from Duvidha, so while the only subtext offered in Duvidha is that of the character of father whose intentions, nature and morality can be gauged through the patriarchal and materialist gaze. Paheli on the other hand gives a narrative to the family and reconciliation of the family become a subplot of the film thus giving a post facto rationalization to the presence of the ghost while the moral compass of Duvidha is very ambiguous and none of the figures appear to be the epitome of morality

Hence what we see here is that Duvidha though rooted in a particular cultural context offers wide range of themes to ponder about. Duvidha is an important text not only of his literary brilliance or its adaptions to film but because it offers templates for discourses on wide social cultural gender issues and questions the moral axis that so dominates our narratives.

Different shades of exploitation: the class dynamics in Lihaaf by Ismat Chugtai

-Santosh Kumar

Ismat chugtai was one of the most prominent Urdu writers of her times and still sways considerable influence in the literary world, so much so, that Tahira Naqvi considers her one of the four pillars of Urdu short story along with likes of Manto, Krishnchander and Rajinder Singh Bedi. But a part of her popularity (and almost all of her controversies) lie in the kind of choices he made in her literary journey. She expressed and explored those themes which were either tabooed (and some are tabooed even now) or were not considered the domain of women writers. Her exploration of homo-eroticism, unabashed sexuality, middle class women sphere etc. were way ahead of the times she was writing in. as a history student, these texts offers a very different vision of the society and offer a perspective which is not possible in traditional Indian literature which mostly fails to consider the underlying patriarchal and class structure inherent to the society rather than as external imposition. Thus we are urged to look at the social milieu of the text as well as the social milieu in which the text itself came to be composed

There are various underlying themes in the text but it is not possible to elaborate all these themes in the limited space. Thus I identified one common thread that is running throughout the text and which could help us to bind all these diverse themes together. And that methodological unit is Class. We will consider Lihaaf as our cornerstone of study to give an effective and compact analysis of the class issue. In Lihaaf,  the first thing that comes to our mind is the bond shared by the begum and her maid Rabbu. I suspect a exploitative class relation in this bond. Begum, in search of companion with a sexual urge and cravings, chose Rabbu for the purpose, which invited a great deal of envy from other maids. Now through the lens of class, we can identify two stratum of class dynamics. First layer consist of  the sexual favors that Begum can afford to ask from her inner circle of maids and confidantes (Rabbu and the narrator). One should ask this question- what was the motivation of Rabbu in this relation? Was it her free will (which is highly improbable) or a deep class inferiority that makes it much easier for the Begums to exercise extra economic coercion on them (similar to what Nawab exercised on the young boys). But there is another side to this class relation- the reason for the envy of maids lie in her closeness with the Begum which allows Rabbu to enjoy certain economic privileges and a temporary sense of upward social mobility. Here we are reminded of Gerda Lerner who points out in a different context, how royal women and concubines in ancient Mesopotamia enjoyed an exalted status as long as they are in favorable position in their relation with the king and lose their position as soon as either she falls out of favor or the king decides to take another one. Similar condition is seen with Rabbu, who gets a shop for her son and a better standing economically in respect to her other counterparts, but her rift with Begum and Begum trying to woo the narrator with material benefits (like dolls etc.) ignites envy in Rabbu which may also signify her insecurity of losing a privileged though exploitative relation with her master to a young girl. It is also worth seeing that the bait for persuasion and coercion is much less for the girl (dolls, toys etc) compared to Rabbu (shop etc.), which show us the internal dynamics within the subjected class. Though the narrator seems better economically and socially (her mother is the sister of the Begum though we don’t see any reference to their material affluence). So even the exalted position of Begum has a lot to do with her marriage with the Nawab, who though absent from the narrative, glances a patriarchal gaze on the characters of the text. So I suspect an attempt on the part of narrator’s  mother to send her frequently to Begum’s house, perhaps in a bid to exalt their own status through their association with a royal family and derive certain material benefits if possible. But the narrator is shown here as a naïve (or innocence has an element of pretension to it, as she is trying to project herself as naïve and indifferent) and doesn’t realize the nature of her behavior with begum. She confess to like begum and is very curious to know what is happening beneath the quilt but there is a huge difference between a unconscious curiosity and conscious experience of such relation at an age when she can’t feel that stimulation. Thus the text reflects a deep seated class dominance and the sense of authoritative, feudal extra economic coercion on the part of Begum (and ironically, an imitation of a patriarchal feudal aristocratic behavior that the Nawab represent and the Begum tends to imitate) and the varied reactions of the have-nots in the relation. One is the realization of the nature of relation and its exploitative structure and trying to derive temporary privileges from that exploitation (Rabbu) or the innocence and inability to grasp the structure and its exploitative nature (narrator).

Though there are various limitations to this analysis with its myopic field of study and its inability to deal with all the elements within the text, it provides a framework to study the text in diverse ways. Lihaaf offers a polemical discourse as well as a window to understand the dynamical class and gender relations and the hierarchy of relations with its structural and teleological validity in the feudal elitist order. It, at the same time, contrasts the chimeras of the child with the actual experiences of the adult, the realization of which came as a rude shock for the child.  A much wider analysis of other elements of this story is beyond the scope of the story but needless to say, the story can be read with its different layers of meanings which exist as an  independent entity as a signifier of social dynamics and at same time act as a site of similitude where these different significations create a larger picture of the space and time it represents.

प्यार में “ग्रो उप”…… गन्दी बात है

-संतोष कुमार

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यूँ तो अपने हाथ में हमेशा पुस्तक का होना सामान्य बात है तथापि कुछ पुस्तके ऐसी भी होती है जिनके पढने की आतुरता कुछ अधिक ही होती है और ये पिपासा पुस्तक की समाप्ति पर ही समाप्त होती है. ऐसी ही एक पुस्तक से कल साक्षात्कार हुआ (क्षितिज भाई को इस सप्रेम भेंट के लिए बहुत बहुत अभिवादन). पुस्तक का नाम था “गन्दी बात” और इनके लेखक है क्षितिज रॉय. मेट्रो से घर जाने के सफ़र में ही आधी किताब पढ़ डाली, और बाकी आधी अगली सुबह कॉलेज जाते हुए. पुस्तक पढ़ते हुए इतने विरोधाभासी विचार मन में आये कि कभी कभार तो ऐसा लगा कि एक विचार पर चिंतन करने से कहीं पिछला विचार भूल न जाऊ. वास्तव में ऐसी कुछ रचनाये होती है जो साहित्य के सिद्धांत का निर्माण करती है, अधिकतर साहित्य उन सिद्धांतो का अनुकरण करती है, और अंततः कुछ रचनायें ऐसी होती है जो बनी बनायीं  परिपाटियों को तोड़ देती है और आपको साहित्य के सिद्धांतो पर पुनर्विचार करने को बाध्य करती है. कुछ ऐसी रचनायें जो आपको ये एहसास कराती है कि साहित्य को पढना भी साहित्य लेखन की तरह एक कला है. “गन्दी बात” ऐसी ही एक रचना है.

हमें आदत पड़ गयी है मौखिक व लिखित शब्दों को पृथक मानने की. हम जैसी भाषा व भाव का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करते है उसका उपयोग साहित्य में करने की कल्पना भी नहीं कर सकते. हमारी भाषा में एक संभ्रांतता आ जाती है और हमारी शैली में एक जटिलता. बोलचाल की भाषा को अक्सर साहित्यिक दृष्टि से हेय समझा जाता है. ऐसे में पूरा का पूरा उपन्यास ठेठ स्थानीय कलेवर में लिख जाना न केवल अनोखा व अनूप प्रयोग है अपितु ये हमारी साहित्य की समझ को भी चुनौती देता है जो अक्सर तत्सम भावी शब्दों को अच्छे शब्दों का पैमाना मान लेते है. पुस्तक की भाषा, पृष्ठभूमि, कथानक, संवाद, चरित्रों सब में एक खुलापन है, एक ऐसा खुलापन जो कई बार अखरता भी है आपकी साहित्यिक संवेदनशीलता को चुनौती देता है परन्तु जैसे जैसे आप किरदार से जुड़ते जाते है आप उनसे बनते जाते हो. शुरू शुरू में खुद को ये याद दिलाना पड़ा कि मैं “एक प्यारी सी प्रेम कहानी” नहीं अपितु “गन्दी बात” पढ़ रहा हूँ. और इसका असर कुछ ये हुआ की कुछ दूर आकर हम  “क्या हो गया ये” को “क्या हो गया बे” पढने लगे थे!

कहानी का कथानक क्या है, साफ़ साफ़ बताना मुश्किल है. सरसरी तौर पर तो ये एक युगल के बीच पत्रों के आदान प्रदान और उनके प्रेम की बदलते परिपाटी, और उनके बदलते समाजशास्त्र व मनोविज्ञान की कथा लगती है, परन्तु ये कहानी केवल गोल्डन या डेज़ी की नहीं है, गोल्डन या डेज़ी जैसे छिछले नाम वास्तव में एक प्रतीक है एक बिम्ब है उन प्रेम कहानियों की जो छोटे नगरो कस्बो में फलती फूलती है और बड़े शहरो की दमघोंटू आबो-हवा में दम तोड़ देती है. ये कथा और चरित्र अपनी भाषा, अपने लहजे और अपनी बातो से अभद्र भी लग सकते थे और कुछ हद तक लगते भी है (जो इसके शीर्षक गन्दी बात को चिर्तार्थ करती है) पर इस अभद्रता और खुलेपन में गहरा मनोविज्ञान गहरा समाजशास्त्र है. कहानी पढ़कर कई बार ऐसा भी प्रतीत हुआ कि वास्तव में, गोल्डन और डेज़ी की कहानी न होकर गोल्डन और डेज़ी खुद एक कथानक है, एक बड़ी कहानी का हिस्सा है. ये कथानक दो सतहों में चलती है- एक बदलती प्रेम कहानी और एक बदलता शहर. मुझे ये कहानी एक “meta narrative” प्रतीत हुई जहां बिहार के छोटे कसबे एक किरदार है, दिल्ली शहर एक किरदार है और सिनेमा सबसे बड़ा किरदार है. जब डेज़ी गोल्डन को “ग्रो उप” पर एक लम्बा व्याख्यान झाडती है और उसे पलटकर गोल्डन से भी जवाब मिलता है, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो दिल्ली जैसे आधुनिक, संभ्रांत शाहर छोटे कस्बो को हिदायत दे रहा हो- “लालायित नजरो से मेरी तरफ देखने भर से मुझे पाना न संभव है न हितकर, सो यदि आगे बढ़ना है और खुद को भीड़ में खो जाने से बचाना चाहते हो तो ग्रो उप” और कसबे झिड़ककर बड़े शहरो को कहते है- “तुम्हारा अनुकरण करने में मैंने अपनी पहचान, संस्कृति, परिवेश, मासूमियत सब गँवा दी  अब तुम चाहते हो कि तुम जैसा बनकर अपनी अस्मिता ही खो दूँ. नहीं कदापि नहीं”. प्यार में “ग्रो उप” करने से अधिक “गन्दी बात” क्या होगी, वो बढ़ना जो बेफिक्र, मनमौजी, अल्हड, बिंदास गोल्डन के मन में एक ऐसा लावा पैदा कर देता है जो कहानी के अंतिम क्षणों में फूट पड़ता है और “ये शहर नहीं सर्कस है”अध्याय में फूटे इस लावे के साथ पूरा कथानक ही दिशा बदल लेता है. गोल्डन का झूठ बोलकर शहर में आना और बेसुध शहर से भाग जाना दोनों शहर के क्रूर चेहरे को उजागर करता है. सिरसा का मुख जहां इंसान तेज़ी से घुसता है, और फिर इस कदर फँस जाता है, कि एक छोटा सा सुराख़ मिलते ही उससे तेज़ी से निकल जाना चाहता है.

सिनेमा इस पूरी रचना का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पक्ष दिखाई पड़ता है. न केवल ये कहानी शहर का अपितु सिनेमा का भी meta narrative है. कहानी में शुरुआत में हमें फिल्म राँझना याद आ गयी, और इस फिल्म को कथानक में देखने के लिए हमें अधिक इंतज़ार नहीं करना पड़ा, और १८वे पृष्ठ पर आपको फिल्म का ज़िक्र मिल जाता है. परन्तु ये एकलौता ऐसा मौका नहीं है, कहानी में इतने फिल्मो व गीतों का ज़िक्र आया है कि यदि उनको कहानी से हटा दिया जाए तो प्रतीत होता है ये उपन्यास लघु कथा रह जायगी. प्रेम की अधिकतर प्रेरणाओ की जननी सिनेमा ही है. कुछ कुछ होता है और डीडीएलजे से प्रेम के पाठ सीखने वाली और कुमार सानू के गीतों में अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति तलाशने वाली हमारी पीढ़ी वास्तव में एक फिल्म में जी रहे है, एक ऐसी फिल्म जिसमें नायक हम है, और हम अपने दैनिक जीवन में उस नायकत्व की तलाश में रहते है जो सिनेमाई दुनिया में हमें बहुत प्रभावित करती है. जो हमें सामाजिक सरोकारों से विद्रोह करने की प्रेरणा देती है और हमारी मानसिकता में रच बस जाती है. गोल्डन और डेज़ी की प्रेम कहानी उस नायकत्व को वास्तविकताओ में सार्थक करने के प्रयास की भी कथा है और कथा है उस वर्ग संघर्ष को पाटने की भी, जो डेज़ी के एलएसआर (लेडी श्री राम कॉलेज) में दाखिल होने से और भी बढ़ गया था. और जिसे पाटने के लिए गोल्डन ने दिल्ली में ड्राईवर बनना स्वीकार किया परन्तु वास्तव में देखा जाए तो गोल्डन के इस फैसले ने उन दोनों के वर्ग विभेद को और अधिक बढ़ा दिया. कहानी का अंत एक सिनेमा के अंत की तरह प्रतीत होता है जहां किरदार अपना वजूद या तो तलाश लेते है या उन्हें उनकी तलाश में एकांत छोड़ दिया जाता है और उसको आत्मसात किये हुए दर्शक को ये एहसास होता है कि वो जो भी देख रहा था वो एक कल्पना थी. गोल्डन और डेज़ी अपनी कहानी के नायक नायिका है, पर वो एक और कथा के किरदार है, एक कहानी उनकी है और दूसरी कहानी के नायक शहर है. एक ऐसा शहर जिसे गोल्डन अपनी महबूबा बनाना चाहता है क्यूंकि वो कभी समाप्त नहीं होती, पर वही शहर जो उसे अंत में भागने को मजबूर कर देती है.

अंत में गोल्डन के करदार के विषय में अंतिम अध्याय में डेज़ी ने जो बाते कही जिससे मेरे ह्रदय में कुछ पंक्तियाँ उभर आई. कैसे समय और परिवेश के साथ इंसान की मासूमियत भी धूमिल  हो जाती है-

“वो लड़का मेरे भीतर का

जो खिलखिलाकर हँसता था

बेपरवाह था, मस्तमौला

आंसुओ का वक़्त नहीं था

न शिकन थी जिसकी बातों में

न दिन में कोई पर्दा था

न घुप अँधेरा रातो में

उस वक़्त में है लौटना

जहाँ रूह को सुकून मिले

वो शांति वो आरजूवो धड़कने वो जुस्तजू

वो नींद और वो ख्वाब

वो भूख का एहसास

सब बिछड़ गए जो हमसे

उन्हें फिर से पाना चाहता हूँ

ताले जड़कर शहर को मैं

घर को जाना चाहता हूँ”

The decline of ‘Devlok’:An Analysis of Devdutt Patnaik’s recent works

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(image source: google images)
A particular book can either aim for scholarly appreciation (like most academic books try to achieve) or popular acclaim. But there are some authors who can tread on both paths effortlessly, achieving bit of both. Their works become even more significant if they are able to place scholarly ideas, innovative content and intellectual discourses into layman’s door, make them accessible and applause worthy for a wider audience without challenging their existing knowledge sphere. Devdutt Patnaik is one of those writers who achieved fame through his informative and interesting take on Indian mythology. I remember getting introduced to Patnaik during my graduation years, when i first read his book “Myth=Mithya: A Handbook of Indian Mythology” which was a brilliant analysis of Puranic mythology. Being a mythology enthusiast myself, i loved the flow of his writing and the interesting analysis of the stories we all knew from our childhood but which we never pondered upon. His book “Jaya: An Illustrated Retelling of the Mahabharata” had a lasting impact on me, and which is still considered his best book of the 30 books he has authored so far. The kind of admiration i had for him encouraged me to follow his articles and blogs etc. but somehow his articles seem to be a pale shadow of his books. But still he was different from many of the authors we are obliged to read for academic purposes. His works were a mix of everything- a narrative, bit of history, mythology, religion etc.

But reading some of his recent works like “My Gita” and “Devlok with Devdutt Patnaik” led me to a rethinking. “Devlok…” is based on the TV show he appears in. i followed that show religiously for the 1st season at least, and for the first time i saw him struggling to answer certain questions. I realized his limitations to historically contextualize mythology that he did very admirably in his book “Indian mythology” or “Jaya…”. I saw him using guesswork sometimes, generalizing certain ideas,  ignoring some other crucial points many a times. Though i am a mythology enthusiast, i am also a history student. To explain mythology in purely philosophical or metaphysical terms is to de-historicize it.  I was missing that Devdutt a bit, who used to delve into the cultural-social-religious milieu of mythology, rather than working just with speculative philosophy.

But this was only the beginning. His new book “my Gita” published last year left me in a state of disappointment. No new knowledge, no analysis, no history, not even mythology. I don’t abhor philosophy, but even abstract philosophy can be contextualized. Even philosophical reflections are determined by the socio-cultural milieu of the period. To study Gita as a metaphysical esoteric text is not what i expected from a mythologist. The book was trying to impress, it seems. Over use of diagrams and illustrations which otherwise would have enhanced the beauty and comprehension of the text came across as unnecessary deviation from the main text. All in all, “my Gita” succeeded neither in reaching to the masses as his interpretation of Gita was way too simplistic; nor it could arouse any scholarly interest. All in all, his “my Gita” was way below his earlier works even by his own standard.

But my disappointment changed to colossal feeling of regret for spending 100 bucks and 2 valuable hours reading a book that was not worth either the price or the time. The book was “Devlok with Devdutt patnaik”. This book as i mentioned earlier, is based on the popular TV show of the same name which is telecast on EPIC channel (it is literally an epic channel!!). When the advertisement for this book came on TV, i thought of ordering the book as soon as possible on Amazon (fortunately or unfortunately i didn’t). So today i bought the book finally from a street side book seller. I was expecting some added details, elaborate explanations, illustrations; some knowledge that i may have forgot and need to be refreshed. But instead what i got was a word to word literal transcript of the TV show. Same language, same information, word by word same. i saw him struggling to put up an adequate explanation for the questions discussed in the TV show, there were wild guesses, there were factual errors and all that factual errors got translated into the text. I was aghast to see, that such a reputed publishing house like penguin random house didn’t even care to review and edit their content before publishing it. I don’t know who is to be blamed for this- the author, the channel who provided the material or the publishers, or this was their collective misgiving but one who suffered from this “collective effort” was the reader. Granted he may have resorted to some wild speculations, committed some factual errors but even more problematic was his casual attitude towards his faithful readers. not only the content of the book very ordinary and weak (i always felt like asking way more complex questions than the one discussed in the show and the book), the retention of the coffee table discussion type approach to the book, makes one ask this question- is this “Devlok” really reaching its zenith, or rather, entangling itself in the web of show-business where packaging matters more than content. Chetan Bhagat degraded himself to pitiable levels, and unfortunately i am seeing another prominent writer who has actually great potential to bring something new to the table, something that can bring consciousness among people regarding their own religion, their own text. Such an author is losing his distinctive voice as his publications are filling more and more shelves.

I hope i am wrong, i hope i will be proved wrong. And i am still hoping…..

  • Santosh Kumar
  • santoshkumarmamgain@gmail.com

Reading Indian Religion through alien lenses: reading “nine lives” as oral history

-santosh kumar

 

The first expression generated from our reading of the book by William darlymple titled “nine lives” is that of awe or surprise. This feeling actually tells us that the version of the narrative that we are getting from the book is that of an “outsider”. The book under purview doesn’t seem to be exactly catering to an intellectual audience nor is it part of any academic exercise. Rather, the author William darlymple has given a narrative to the cases he presents. He himself in the introduction mention it as a “non- fiction short story” or a “travelogue” rather than a work of history. Though, the text in most part seems to be biographies of the individuals interviewed by darlymple, the author has successfully placed the oral interviews in a historical context which makes it a compelling source of  studying oral history though the author does not himself claim any such thing. This book is then the collection of accounts of nine different people in India with entirely different backgrounds though with a common theme- religion and/or spirituality. Though the stories are not linked to each other and could be seen as separate entities and are complete in themselves, we do find certain common themes that underline the narrative. So it seems better to study the text dividing it on the basis of the themes it offers rather than discussing it chapter wise. This will help in bringing out the points that the text either projects or brings out unintentionally. Though we need to corroborate the ideas presented by the text, to avoid the gravest mistake in reading a text, particularly based on an oral source- that is, to take the account at face value. Here, we will discuss the religious, social, culture histories through the eyes of an author who we assume is stranger to the surroundings he describes. This adds the element of perception to the text.  Here, we must emphasize that certain generalizations may creep in our analysis which acts like a subjective observations of the text which not always a proof for its validation given the narrative form of the text. These observations most of the times comes from our attempts to read between the lines and thus may be sometimes our misreading the text. Thus the present analysis should be read as critically as we read the work of William darlymple lest some of our observations come across the readers as our own biases.

 

  1. Western perception of India-

 

There are certain things that we need to keep in mind while reading the text. Firstly, we need to take this fact into consideration that our author William darlymple is not a native of India. No matter how closely he works in India, the point of view projected in the text remains an outsider’s view in the context of Indian religious traditions (even an indigenous scholar would have been an outsider to the vast number of heterogeneous cultures that are explored in the text and the element of perception will never cease to exist no matter who the writer is, given the huge geographical and cultural space the text covers. But by an outsider’s view here we are concerned about an exotic view of Indian culture which in words of timothy Mitchell sees the oriental world as “exhibits”. It is a layperson view and no longer valid that oral sources are abstract formless ideas and interviewer plays a passive role in the compilation of oral history. In oral sources as well it is the interviewer who asks certain type of questions, chooses and omits the given material and presents the interview in a particular presentable style. A good example of this is Urvashi Butalia’s work on partition, “the other side of silence”, where she  herself admits that from the plethora of evidence and cases available and a huge chunk of recorded evidence on disposal she included in her book only those portions which she find interesting. So, the perception of the author is fairly important as in this context, the author, we assume, though not a completely novice about Indian culture, may not be aware of the heterogeneous religious traditions across India considering the extent to which his text is spread. There are certain trends recorded in the text which are not always easy to classify as the ambiguous category of “Hinduism” and such classifications tends to be quite loose. Here, lie the perceptions of the author in specific and European perceptions in general regarding India and Indian religion. Though the author avoids judging the stories he has been told (barring a few exceptions) his observations at certain points do reflect his western bias and which is actually more important aspect to look at. Most of the times, this bias get reflected in his use of language and the terminology he adopts in the text. After critically reading the text, we observe that before meeting the person and the place of his interview, he assumes that the society he is visiting is a “pre-modern society” in his own words. And thus in many points in the text he get surprised by the development of certain places. This is perhaps the most common western perception of the west about the Orientals that there is a changeless, static, monolithic society and often developments fill them with surprise. In the introduction of the text he compares the rural hinterland with developing urban city of Gurgaon and sees the former as “pre-modern”, “backward”. Such observations, though not negatively contextualized, nevertheless help in understanding the psyche of the author. At the point of discussion of the tantric practices in Bengal, he quotes the point of view of laypeople who consider the practice as “savage”. Even though the author is not condoning this view, he is presenting it in a matter of fact way and has not used “inverted commas” to suggest that there is any difference between the author’s point of view and general perception about tantricism.

 

Conversely we also locate, in certain places, how the author is perceived by the local people in India. Since the author was foreigner and alien to the culture there must be feeling exited, suspicious, hesitant etc but none of such expressions is recorded in the text. The interviews are recorded plainly in most cases with a sense of indifference to the identity of the author (except in case of the Jain monk). A very interesting observation here is that barring the cases where the person interviewed is a female (and in no case is she a household women) in all other cases where the person is interviewed even within a family, we don’t get to know the perception of the women of the household, even though she also played a part in the ritual and traditions. Like in the case of bard Mohan Bhopa, where his wife accompanied him for singing the folklore doesn’t feature at all in the interview except serving food! This we can see as an example of hierarchy, even within the household tales or folk stories, which pass on to from generation to generation. The public visibility of these women folklorists seems to get reduced if the audience or the listener is not one of their kinsmen. The perception about the foreign interviewer also depends upon the background of the interviewee. Like while in the case of devdasis, the author mentions that he was misunderstood by the local people as one of her “clients”. Conversely, while interviewing the Jain monk Prasenmati mataji, the author was not allowed to enter her dining room as “he was not bathed and he may have eaten meat”.  Thus the western perception about India and vice versa alters with the change in context and on the nature of people and locality.

 

 

  1. Decoding the language-

 

Language becomes very important in the context of perception. As we said earlier the author creates this illusion that there were very normal circumstances under which the interview was conducted but he omits the problem of language from his text. William darlymple during his course of study, traveled from one extreme to the other in Indian subcontinent even travelling across border of India to sahiwan in Pakistan. Though, throughout the text, he creates this illusion that he had a one to one interaction with the people he interviewed. But given the extent of his travelling and the linguistic heterogeneity of the region it doesn’t seem possible until one is multilingual (in so many language) or you have an interpreter/translator/mediator working for you.  The translator is the one who will understand your question in your language, communicate it to the interviewee in their language, take input in their language, and reconvert it into the language of the interviewer.  But this poses two problems- firstly; we don’t get to see the role of the interpreter in the text. This reminds us of E.H.Carr who points out how historians choose to omit and select his fact but the process of selection starts at the level of archive only. The author may want us to believe that there was no role played by the interviewee and the interpreter except providing the knowledge but actually it is they who  choose what to tell and what to not. Interpreter has this arduous task of making sense of this information (as Philip Wagoner points out in the context of colonial archive that the native intermediaries are not just passive informants but active collaborationist) and translating the knowledge in the language of the interviewer. But this poses a problem. Certain terms and certain concepts are cultural specific which may not have an exact translation in other language. Thus what the interpreter translates is the closest meaning available in the vocabulary. This in itself considerably alters the meaning of the text. This also creates confusion related to certain concepts which a foreign scholar finds difficult to comprehend. For example, when Prasenmati mataji talked about the relevance of salenkhana in Jainism, darlymple tried to reason out with her, and objected it as a “form of suicide”. That’s perhaps due to a lack of western counterpart to such concepts or inability of the language to translate all the nuances attached with the term. Thus a small but important difference may arise between the “perceived meaning” and the “actual meaning”.

 

  1. Knowing the unknown through the known-

 

Another aspect of being an outsider, especially a foreigner is choosing your target audience. William darlymple, apart from the Indian audience, also seems to write for the western readers of his books. Many of the westerners may have a very scanty knowledge of the in depth study of Indian religions that William darlymple provides in the book. Thus this becomes for the author to explain these traditions to these audience while maintaining the narrative form of the text. And here we come to our next problem. For a long time, westerners worked on this truism-“knowing the unknown through the known”, that is, through citing similarities between cultures. For knowing about an unknown culture this needs to be known with a culture which is already known.  A prime of this we find in this text. In the case of the Jain monk, the author constantly compares Jainism with Buddhism and even introduces Jainism as “this is a religion similar to Buddhism”. This is perhaps because while Buddhism is a world known religion Jainism is hardly known beyond India much less in Europe. Thus to make people understand a relatively unknown culture he compares it with Buddhism citing similarities between their main tenets like non violence, austerity, heterodox sects etc. so the information an author derives from the text is a comparative and approximate meaning of Jainism with Buddhism as a reference point. This is perhaps a short coming of oral sources that many a times they tends to be culture specific which is hard to understand without assistance. Though a.k. Ramanujan has shown through his works that folk tales travel thus we can understand much of the cross cultural stories easily. But it becomes more difficult to understand a whole culture or religion orally or in this case writing transmitted from oral interviews.

 

  1. Oral and written- corroborations and alternative history

 

While reading the text we need to keep in mind that the basic premise of this text is based on interviews which are oral sources. There are problems related to study of sources like these. For example the question of authorship which actually is ascribed to the interviewer rather than the interviewee although it is the later who provides the inputs for the text. Other question is related to the reliability of the text.  Ron Grele had questioned the interviews as historical text or interpretative history owing to the problems of reliability of individual testimony,  comparison between oral and written sources according to him is inevitable. Though this strict demarcation between oral and written has been now refuted, in this case, when the author is a foreigner, it becomes all the more difficult for him to verify the statements of the interviewee. Conversely, an additional problem arises when the author tries to fill the gap in the narrative through his own perception and imagination. According to Natalie Zemon Davis, most records belonging to small town or countryside characterize their inhabitants as naive, simple, domestic etc. this characterization does not remain restricted to the literature but also the administrative and legal documentation as well. Thus it is more likely for an oral history writer to use this characterization for convenience. Thus, not only the perception of the author but the state records as corroborative source gets misled by this generalization. Thus, neither the oral nor the written material should be taken for face value and like written state records oral sources should also be treated as an archival source and should be read critically.

 

Another point within this subtopic is the nature of oral sources. Apart from what the interviewee directly tells to the author, what he doesn’t tell or doesn’t choose to tell is also a source of knowledge for which the interviewer needs to “read between the lines”. Here, the background of the interviewee becomes very important. There are contrasts in ideas with change in background. For example two people associated with folklore, Mohan Bhopa and Komal Kothari can be used as an example. Mohan Bhopa was a little educated folksinger of the epic of the local deity pabuji maharaj trying to keep the tradition alive by performing regularly, whereas Komal Kothari is an educated folklorist who is credited for reviving the dying art of folklore. Now, while Mohan Bhopa’s intention is to keep the tradition alive of folklore in his area and his community which is being diminishing either due to ignorance or due to its commercialization. Ironically, Komal Kothari is the one who is trying to revive the art by bringing out CD’s of the oral epics which is hampering the business of performing artists like Mohan Bhopa as Mohan Bhopa tells darlymple that people are preferring 3 hours CD’s than 7 days performance. Though William darlymple mentions Komal Kothari in his text, he couldn’t think of the contrast that exists between the two people of similar interests but with diametrically opposite stands. In most stories of the text, interviewee talks about their beliefs and often justifies their superstitions. While the author doesn’t make any judgment on such beliefs, we can unconsciously study the characters of the people interviewed and the people associated with the traditions they represent.

 

  1. Reading history through the myths- the great and the little traditions

As said earlier, apart from the direct information extracted from the interviews, other sources of knowledge are also useful. This includes folklore, myths, legends etc. we don’t need to just study these myths as depiction of their own societal structures but we can read their motives behind constructing such myths. Intentionally or unintentionally we don’t know, but none of the cases in the book belongs to the orthodox religious system. Even discussing the very broad traditions of Hinduism, the cases presented are not the brahmanical traditions. The cases include that of a low caste theyyam dancer, a bardic poet, a tantric women, devdasis etc. Not only does these myths project an alternative mythology which is quite different from the brahmanical versions, they are also many a times, (though not always) challenge the brahmanical notions. In one story of a Sufi saint the narrative presents a view which stands opposite to orthodox Islam. Thus, the narrative projects an “unorthodox”, “heterogeneous” form of religion. Thus these myths also vary with change in society, status of myth makers and the reason for creation of myth. For example in the case of theyyam dancers, the story goes like this- in order to teach lesson to Adi Shankracharya for discriminating against the untouchables, lord Shiva came in disguise of a low caste man and taught him a lesson on humility. Myths of these type adopted by the marginal sections of the society acted as a mark of protest against the casteist brahmanical elites who kept them at bay. Often such myths originate from the lower strata of the society and thus here background becomes even more important. But as pointed out by a.k Ramanujan the great traditions and little traditions are not always antagonist to each other. We find ample examples where brahmanical stories and deities get incorporated into folklore and conversely many local deities were incorporated into the mainstream traditions as demigods and sometimes even god. The oral tradition of Ramayana is an excellent example of this where different tribal regions try to legitimize themselves through association with the characters of these epic.  For example, to legitimize and deify a 14th century cattle warrior to status of a deity, myth was created assimilating that warrior turned deity pabuji maharaj with Ravana. According to this story, pabuji maharaj defeated Ravana and bring camels from lanka to rajasthan. This is not just an attempt to seek legitimization for the deity but rather taking their eponymous roots to the timeless past and defeating Ravana helps in elevating the status of the society from cattle rearing communities to a more mainstream social status. In some other cases, myths acted as a didactic statement to emphasize the importance of certain modern institutions. For example, in a tribal version of Ramayana, Rama is shown as a school going child. Here myths work to encourage modern education among the tribal people. Similarly the story of kach and Shukracharya could be read as a statement to discourage alcoholism among Brahmins. Thus myths that are stated in the book as anecdotes of the traditions associated with the interviewee could be read as a statement of legitimization, identity and protest. As according to a.k. Ramanujan, these myths despite being located in the distant past are aware of their contemporary times. For example, like in the case of theyyam dancers, they point out that lord Shiva married a girl of their village, and there folklore was centered on their celebration of their marriage. Especially important is their assertion that the marriage took place in the fields of the village and therefore they celebrate their festivals around their fields only. We can sense some sort of agricultural rites as the basis of the celebration around which the myth have been created. These myths also sometimes reflect the ongoing tussle in the contemporary society which gets reflected in the retelling of certain myths in a different way. For example in a local retelling of Ramayana, the battle is not fought between Rama and Ravana but rather between sons of Rama and Lakshman. According to this story, Lakshman accidentally ate beef and became Muslim. Thus he had two sons’ Hassan and Husain who were killed by Luv and Kush. We can sense communal tendencies in this story whose roots can be seeped in modern times. So myths make more sense if studied in the socio-cultural setup which gives rise to such myths.

 

  1. Religion and the role of state-

While reading darlymple’s “nine lives”, in most of the interviews, we can see the invisible hand of state in the space of religion and spirituality as well, which in most cases, is considered a private space. We can read from the text, the instances, where state intervenes in the religious sphere of life. Firstly; in the case of Mohan Bhopa and the declining bardic traditions and oral epics in India, we can sense a role of the state indirectly in this decline. After 1857, we see attempts of the state to extract stratified, crystallized form of knowledge about the colonies which could be used to further enhance their rule. Thus they moved away from the “messy” knowledge of myths, legends etc like that of McKenzie’s archive to more systematic written brahmanical codes and texts. Even the Brahmins or Islamic ulemas etc associated with the colonial government seems to brutally ignore the rich oral tradition in India. Perhaps because, one; they were difficult to classify within a watertight category and secondly, it was difficult to corroborate the chunk of unorganized and unwritten sources with the brahmanical texts. Also perhaps the exclusive monopoly of written texts over oral sources allowed the dominance of the Brahmins and the ulemas to give impetus to the codified knowledge over which they have complete mastery and which helped them acquiring a share in the power. Of late there were attempts to write down these oral epics for their conservation but many more such epics died out or are still dying due to lack of patronage on the part of government. William darlymple tells us how some oral epics which for centuries were sung in the shrines and hospices, slowly died out due to lack of patronage and alleged competition with the written sources. Due to lack of economic viability of these traditions, even the younger generation is hesitant to inherit the oral traditions from their ancestor. Like, Mohan Bhopa’s son took another profession rather than joining his father’s occupation. While for people like Komal Kothari the question is more about the dying art which needs to be conserved, for Mohan Bhopa the question was also about his livelihood and social status which is exemplified due to the respect of the occupation he is doing. Thus not only patronage/support the motive of patronage/support (economic or academic) becomes equally important.

 

Another aspect of the role of state is the question of morality. The perception of state towards religion is not always neutral. Like in the book, one of the cases is about the tantric practices in Bengal which till late 19th century was organized in open spaces in temples, but after 1880’s, this practice was banned by the colonial government on the charges of indecency (for the sexual yogic practices associated with tantricism). But this could also be seen as the policy of appeasement of dominant social classes by the state, as the authorities who complained against these practices, were by and large the orthodox brahmanical classes. Similarly, devdasis tradition or the temple girls, who were earlier given patronage by the big temples, later on refused to acknowledge any such practices in their premises when the government decided to ban it on charges on women exploitation and prostitution. In the text, we find two opposite accounts, one of the devdasis who consider still, the temples as their agency, and the temple priests, who refused to tell the author about any information on devdasis refuting such charges completely. Thus, the reading of the text how state intervention changes the relation between people or agencies associated with a particular tradition.

Third example of intervention of state comes from the story of the Buddhist monk. Here, the peaceful and religious life of the Buddhist monks of Tibet is disturbed by the Chinese invasion which forced them not just to flee to India but also against their religious practices- to take up arms. This tells us how state and authority changes the relation of the person with his own religious tradition. Interestingly, this person joins the Indian army, serves for 30 years, retires and then as an act of repentance of his son, becomes a Buddhist monk again!

Thus, the idea that state and religion are two parallel agencies is not completely true as both gets influenced by each other and influence each other in different ways.

 

  1. Dialectics within a religion-

 

The common layman perspective on religion devoid it of any dynamics and often religion is expressed in a one dimensional, monolithic, changeless form. William darlymple’s work not only helps us understand the heterogeneity within a religion, it tells about the dialectical relation that may exist within a religious tradition. Sometimes we come across two entirely different traditions within the same faith that are not only opposite but sometimes also hostile to each other. For example, the case of the Sufi saint in sahiwan is a classic example of this. Here, on a rare occasion, the author incorporates the view of the interviewee, who is a female Sufi saint, but also the representative of the Wahhabi institution nearby, both of being highly critical of each other’s views. While the Sufi saint believe in the union of souls, ecstasy, music and dance as an expression of love and devotion to god. They feel that orthodoxy is ruining the spirit of Islam. On the other hand, Wahhabi representative points out that these Sufi saints are mostly illiterate and don’t have any knowledge of scriptures and are misleading people. According to him, people are more inclined towards the abstract ideas of the Sufism and that’s why they are not sending their children in enough numbers to their institution. This conflict we find is not just limited to just ideas but it has taken quite violent turn as well. For example, the Sufi tombs were few years ago, bombed by the Wahhabi. Thus, the study of the text enables us to understand not only the different ideologies that co-exist within a religion but also the historical background of these conflicts and finally the propaganda and justifications of each of these traditions to prove themselves as the actual representative of that religion (and how religion is manipulated to suit their ideologies). But not always the conflicting ideas became hostile; sometimes there is a mutual recognition of the dissenting perspectives. Like for example the case of theyyam dancers, whose dance dramas mock and criticize the brahmanical classes as oppressors. In most of the cases, the brahmanical class not only tolerates but is a faithful audience of these dances. The case of the theyyam dancer in the text tells us, how in some cases these upper class people venerate those theyyam deities. This actually is an example of how different socio cultural backgrounds lead to different responses to the dialectics.

 

Finally, what we can make out from our discussion is that, the text though written by a foreign author whose perceptions are unintentionally sometimes comes in between the narrative, though overall this is a fairly engaging narrative which helps us in studying the dynamics of the religious sphere in India. Here, we study religion, not as a set of dogmas or a belief system but rather as a socio cultural institution. We can sense the politics of religion and how they affect and get affected by each other. Though this text has its own set of shortcomings which can’t be neglected and which cautions us to not take the perspective of the narrative uncritically. William darlymple does the same mistake which was done by Urvashi Butalia in “the other side of silence”. That is, being sympathetic with a particular version of story. That’s why it is urged to read the oral testimonies as archival source by decoding the language and perspective from the text and see it critically. Like, in the case of the Sufi saint of Sahiwan, though the author incorporates two different perspectives- one of Sufi saint and other of Wahhabi representative, we can see his inclination and sympathy towards the version of the Sufi saint.  Similarly, in the case of the Buddhist monk, we don’t get the corroborative perspective from the Chinese officials and in most cases we see the stories from a one dimensional perspective. As a historian, we should read the cases critically and should be able to read what lies beneath and beyond these stories. Then we can use this text for constructing the historical narrative of religious life in a more accurate way.

 

 

Bibliography

  1. William darlymple- “nine lives- in search of sacred in modern India”
  2. Natalie Zemon Davis- “the return of martin guerre”
  3. D.N. Jha (ed.)- “symbols and stereotypes: essays on Indian history and culture”
  4. Rustam bharucha- “Rajasthan an oral history- conversations with Komal Kothari”
  5. Urvashi Butalia-“the other side of silence”
  6. Robert perks and Alistair Thomson (ed.)- “oral history reader”
  7. A.k. Ramanujan- “the collected essay of a.k. Ramanujan”
  8. Devdutt patnaik- “myth=mithya”
  9. Phillip Wagoner- “pre-colonial intellectual and the production of colonial knowledge”
  10. E.H.Carr- “what is history”