विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

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Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

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Duvidha: the dilemma inside and out

-Santosh kumar

The juxtaposition of narrative and visual give new dimensions to the narrative and open up new vistas of interpretations and possibilities. Reading and watching Duvidha, a story by Vijaydan Detha immortalized on the celluloid by Mani Kaul in 1973 familiarizes us with these feelings. There are various others precedents as well as successors to the story. Reading A.K.Ramanujan’s translation of the Kannada story “the serpent lover” makes you realize the broad similarities between the two. There was a film made on the Kannada folk tale called Nagamandalam and Detha’s story was made into paheli in 2005.

If we try to analyze the narrative, it offers you very contrasting possibilities. Firstly if seen from the perspective of gender and society the story seems to be placed in a feudal patriarchal setup where women’s voice appears in hushes and silences because the norms of propriety are to be decided by her husband and more importantly by her father in law. Property and material prosperity is counterpoised with sentiments and feelings and at this conjecture we feel the need to go beyond the confines of patriarchy to view it in structural and psychoanalytical terms. And I will try here to juxtapose Ramanujan and Freud together. This story is a good representation of what he calls women’s tale, but we must be cautioned against the use of term “counter tales” because nowhere in the text is there any attempt to counter the patriarchal domain but it merely opens up avenues for women’s desires and her voice to creep in a subtle manner. Even psychoanalytically this text can be interpreted in contrasting ways. In a more conservative interpretation the text may point out the pitfalls of transgressing the norms of propriety. The act of unveiling by the women makes her vulnerable to the gaze of the ghost, which sets off the chain of events. Thus this interpretation makes the story similar to the “little red riding hood” where the girl makes herself vulnerable to the gaze of the jackal and using tropes of material pleasure (here the flower in Duvidha the fruit) and was able to encroach her space as well as her sexuality. But if the same story is seen from the perspective of the woman, then the story is very much similar to the serpent’s lover wherein the woman finds avenue for the satiation of her desires through the impostor which is exactly the case with Duvidha. In both the cases the impostor is met with a tragic end but curiously the women is not ridiculed or shunned off but rather accepted in the patriarchal domain easily.thus the text challenges, as according to Ramanujan, the norms of chastity and propriety by inverting symbols and their signification as well as the punitive measures of these transgressions. For example an impostor or a man other than her legitimate husband is seen as a potential threat to the sexuality of women and thus to the patriarchal household. But the woman accepted the ghost as her partner despite being conscious of his identity thus challenging the regulations set up by the patriarchal household

There are couple of other ways to situate and analyse the narrative. For example two hypothetical possibilities can be discerned through a careful reading of the text and the film. One, seen through the lenses of pragmatic Freudian terms, the whole story can be mere pigment of imagination of the woman. The husband never went outside his house, but his indifference was equal to his absence. The woman was easily accepted in the family because the child belonged to the same man and the not the ghost. The ghost represents the unconscious desire of the women of seeing a more loving empathetic and caring husband. Secondly seen from the perspective of the husband the story can actually deal with the existential crisis of the husband who is in dilemma regarding his two conflicting duties- that of a money minded person meant to please his overtly money minded father, and playing a more loving and empathetic companion for her wife. In that sense we can interpret that perhaps the ghost was an alter ego of the husband. Either he went for trade but came back realizing his misgivings to his wife and by giving coins to his father he earned the concessions to live his conjugal life thus balancing his material and sentimental existence. The problem arise when the wife become pregnant and that bring the sentimental facet of husband more clearly and which seems to disrupt and overshadow his material existence. This action created anxiety in the materialist patriarchal domain and the man fell into an existential crisis where one of the identities needs to be purged to maintain the hegemony of the material world. Of course these interpretation are way too abstract and we can’t cite evidence for the interpretation except for the subtle subjective clues that could be interpreted in different ways.

Coming to the film, we also need to consider the way a movie is made and the representations of the film. The very abstract film making style and monotonous dialogue delivery of the actors makes us realize that the film doesn’t make you root for actors or characters but the rich visual spectacle through its spellbinding cinematography makes the film focus on the cultural context and tries to use these visuals as a text in itself. The still photographs are meant to be gazed and interpreted, the excessive use of contrasting lights and shades may be symbolical of different shades of human existence. The movie apart from a narrative is also a visual archive, the most visible example of which is the scene where the whole cycle of time when ghost and woman were together, was represented through a panorama of visual imagery without uttering a single word in those 5-10 minutes. But even then the film is more honest to the original story as compared to Paheli. Now we can see a change in attitude in those 30-40 years between the two. Paheli’s climax gives a subtle hint that the woman is met with the ghost again and not her husband which actually points out women’s choice winning over the patriarchal confines but in Duvidha the victory of the women lie in her ability to re assimilate in the patriarchal family even after her relation to the impostor. Duvidha raise question but as most of the parallel cinema of this time leaves the answer for viewer’s discretion. Paheli in answering the question creates an anachronism by juxtaposing traditionalism and modernity. Also Paheli gives in some detail the mention of the family of the man, which is completely absent from Duvidha, so while the only subtext offered in Duvidha is that of the character of father whose intentions, nature and morality can be gauged through the patriarchal and materialist gaze. Paheli on the other hand gives a narrative to the family and reconciliation of the family become a subplot of the film thus giving a post facto rationalization to the presence of the ghost while the moral compass of Duvidha is very ambiguous and none of the figures appear to be the epitome of morality

Hence what we see here is that Duvidha though rooted in a particular cultural context offers wide range of themes to ponder about. Duvidha is an important text not only of his literary brilliance or its adaptions to film but because it offers templates for discourses on wide social cultural gender issues and questions the moral axis that so dominates our narratives.

Battle of Histories: The Academic and the Public

-Kriti Tripathi

The discipline of history leads a dual life: an academic and a public one. History lives its academic life through “journals, reviews, specialized conferences, university departments, professional associations and so on.”[1] In India, where mostly the views of historians are not seen as representative of the past because universities do not carry much social authority, the interaction of these domains create tension. The basic categories of the discipline such as “research, facts, truth, evidence, archives- can be moulded by the interaction between history’s cloistered and public life.”[2] History writing in India cannot remain unaffected by identity politics associated with regions, religions, castes or sects. Popular “sentiments” create a barrier not only for historians but also for writers, movie-directors, artists etc. Under the garb of public sentiment some political parties use history as a weapon and play out their politics of divide and rule for the purpose of filling their vote banks. From the 1990s onwards popular commemoration of certain episodes have taken centre stage in Indian politics with violent and bloody consequences. History is assumed to be an embodiment of popular beliefs and memories and in situations when the truth breaks this web of imagination, violence seems inevitable with the urge to rewrite history. In the present paper I shall put forward three case studies to elucidate the practice of public contestation of academic history which is prevalent in India.

 

The Mosque-Temple Controversy in Ayodhya

Today, Indian Hindus and Muslims see themselves as distinct religious communities, essentially two separate nations occupying the same ground.[3] In post-independence era, a nationalist view emerged that Hindu beliefs were continually suppressed and its institutions repeatedly violated from 1206 C.E. onwards, with the establishment of Muslim rule. The dilapidated Hindu temples are shown as the visual proof of invaders’ atrocities on Hindus. The Babri Masjid was constructed in Ayodhya by one of Babur’s soldiers in 1528 C.E. Two major unanswered questions have sparked the controversy: Is Ayodhya a birthplace of Ram and was the mosque constructed on the ruins of a temple. Hindus answer both the questions in an affirmative tone. According to them the mosque was built on top of an 11th century temple marking the birthplace of Ram. The first clear evidence of dispute occurred in 1822. In September 1990, BJP leader L.K. Advani launched a nationwide campaign in support of the movement for the construction of Ram temple at that particular spot where the mosque stood. A 10,000 km. Ratha Yatra was organised with the slogan: mandir wohin banayenge (we will build the temple there and only there).

On 6 December, 1992, an infuriated Hindu mob demolished the mosque. The government’s decision to rebuild the mosque, announced in the first flush of post demolition guilt, was supported by only 35.7% of Indians, and Hindus disapproved of the decision by a margin of 59:30.[4] On 9th May,2011, the Supreme Court of India put a stay on Allahabad High Court verdict that directed division of 2.77 acres of the disputed land in three parts: among Hindus, Muslims and the Nirmohi Akhara. According to the verdict there was a temple of 12th century C.E. which was destroyed to build the mosque. The excavations of A.S.I. and its readings have been fully accepted even though these have been strongly disputed by other archaeologists and historians and since it is a matter of professional expertise on which there was a sharp difference of opinion, the categorical acceptance of one point of view, and that to in a simplistic manner, does little to build confidence in the verdict.[5]  According to Hindu fundamentalist groups: religion is a matter of belief and faith and their belief that Ram’s temple was located at that exact spot gives a sanction to their violent program.

 

The Laine Controversy

Various development plans, airports, railway stations, public parks, squares, schools and universities in Maharashtra are named after the historical figure of Shivaji Bhonsle. In 1674 C.E. Shivaji crowned himself as Chhatrapati with the aim to establish Hindavi Swarajya in order to fight against the Mughal ruler Aurangzeb. By the final decades of the 19th century Shivaji came to be celebrated in poetry, drama and historical fiction. Bal Gangadhar Tilak started Shivaji festival, a public commemoration of his birth. Maratha historical memory has been crucial not only to the creation of a modern regional Marathi identity in Western India but also to the successful articulation of that identity within wider Hindu and Indian national imaginations.[6]

On January 5, 2004 a group called the Sambhaji Brigade attacked the Bhandarkar Oriental Research Institute in Pune. It was triggered by the publication of James W. Laine’s book “ Shivaji: Hindu King in Islamic India.” Some prominent historians and politicians charged that the study defamed the memory of Shivaji’s mother Jijabai and his father Shahji. Laine wrote that Shivaji’s parents lived apart for a long time, adding that, “Maharashtrians tell jokes naughtily suggesting that his guardian Konddeo was his biological father.” This was interpreted as if Laine wanted to give an expression of Shivaji’s illegitimacy. His book sparked a major controversy in India leading Oxford University Press to withdraw it from the local markets.  Laine had done some research at Pune’s Institute and he had thanked the institute and some scholars affiliated with it in his acknowledgement section and thus it came under a violent attack. Even the unique objects of historical and literary importance were not spared. More seriously still, they severely damaged a first-century manuscript of the great Hindu epic the Mahabharata, as well as a set of palm leaf inscriptions, some important relics from the prehistoric site of Mohenjo-Daro, and a very early copy of the Rig Veda—the world’s oldest sacred text.[7]

 

The Padmavati Controversy

The story that has been in circulation since centuries describes Padmini, the wife of Chittor’s king Ratansen, as a woman of unparalleled beauty. In the year 1303 Chittor was attacked by Delhi’s sultan Allauddin Khalji, apparently to acquire Padmini. He wanted to have a glimpse of her and in lieu of which he promised to lift the siege. However, he could only see the reflected image of her as the Rajput woman did not allow a stranger to even look at her. Captivated by her charm, he decided to win her and captured Ratansen by deceit. Eventually the Rajput army was defeated by the sultan. Padmini and other Rajput women committed jauhar in order to protect themselves from Muslims.

In the month of January this year, activists of the Rajput Karni Sena attacked the sets of Sanjay Leela Bhansali’s film Padmavati. The whole episode was based on the assumption by Rajputs that Bhansali was going to shoot a dream sequence in which physical love between Padmavati and Khalji was going to be manifested. The director negated all such charges. Karni Sena is keen to protect the lineage of their ancestors from any misrepresentation. The Rajputs portray themselves as the ones who resisted the Turkish and the Mughal rule at the cost of their lives. The spirit is claimed to have also resided in Rajput women who are said to have committed Sati and jauhar when faced with the prospect of loss of honour at the hands of Muslims.[8] The memory of marriages between Rajput princesses and Mughal rulers is not often easily accepted by the community today as it represented Hindu capitulation to a Muslim empire.

Ramya Sreenivasan in her book, The Many Lives of a Rajput Queen: Heroic Pasts in India c. 1500-1900, makes it clear that Padmini was a fictional figure created in the poem ‘Padmavat’ written by Malik Mohammad Jayasi in the 16th century. It describes Padmini as the beautiful princess of Simhala-dwipa. She had a talking parrot Hiramani who, on being berated by the king of Simhala- dwipa, flew away to Chittor and informed king Ratansen of the beauty of Padmini. Being completely mesmerized by Hiramani’s account of Padmini, the king wished to marry her and managed to do so after a long series of dramatic battles and adventurous trials. Between 16th and 19th century at least 12 Persian and Urdu translations or adaptations of Jayasi’s Padmavat were produced. The idea that Padmini was a fictitious figure, or a Sufic ideal, is unimportant to Rajput imagination as to them she is as real as the famed Rajput valour .[9]

 

Conclusion

Few days back the education minister of Rajasthan Vasudev Devnani claimed that it was Maharana Pratap who won the battle of Haldi ghati in 1576 and not Akbar. “Some books on history say that Akbar was great but various research show that it was Maharana Pratap who was great. But it is obvious only one of them could be great,” he said.  A few years ago Ashutosh Gowarikar’s historical movie Jodhaa Akbar was banned for some days in various states on the charge of hurting the sentiments of the Rajput community and twisting history. According to them Jodha was not Akbar’s wife. Presently and as well as in the past the NDA government has tried to “saffronise” the content of NCERT books, that is to mould the history according to Hindu nationalist views and in accordance with party’s political views.

The popular view depicts Muslims as outsiders and invaders who do not have right on Hindustan and various programs such as “Ghar-Vapasi” are organised to bring back people to Hindu faith. The Muslims of India should not be held accountable for the actions of Mahmud of Ghazni (971-1030), Allauddin Khalji (1296-1316) or Aurangzeb (1658-1707). Even judging their actions as atrocities according to the norms of the contemporary society, would be an injustice as L.P. Hartley puts it rightly in his novel “The Go- Between”: “The past is a foreign country, they do things differently there.” History is what had happened in the past and not what would have happened. Indians of all faiths must accept the reality of their history, cherish it and take care to preserve it instead of engaging in efforts to rewrite it because trying to undo the past and remedy wrongs that go back several centuries in time will only wreck the present for all concerned.[10] To conclude the essay I would like to quote Romila Thapar’s words: “What happened in history, happened. It cannot be changed.  We cannot change the past to justify the politics of the present.”

 

Sources

  1. Chakrabarty, Dipesh, The Calling of History: Sir Jadunath Sarkar and His Empire of Truth, The University of Chicago Press, 2015.
  2. Deshpande, Prachi, Historical Memory and Identity in Western India 1700-1960, Permanent Black, 2007.
  3. Thakur, Ramesh, Ayodhya and the Politics of India’s Secularism: A Double Standards Discourse, Asia Survey, Vol. 33, No. 7, The Regents of University of California, 1993.
  4. Thapar, Romila, The Verdict on Ayodhya: A historian’s Perspective, The Hindu, Oct 2, 2010.
  5. Mukhia ,Harbans, Myth, History and Nationalism: The Temple- Mosque Controversy in India.
  6. Lee Novetzke, Christian, The Laine Controversy and the Study of Hinduism, International Journal of Hindu Studies 8, World Heritage Press India, 2005.
  7. Dalrymple, William, India: The War Over History, The New York Review of Books, April 7, 2005.
  8. Talbot, Cynthia, Inscribing the Other, Inscribing the Self: Hindu- Muslim Identities in Pre-Colonial India, Cambridge University Press,
  9. Kothiyal, Tanuja, 29 Jan, 2017, http://www.scroll.in
  10. Sreenivasan, Ramya, The Many Lives of a Rajput Queen: heroic Pasts in India c. 1500-1900, University of Washington Press, 2007.
  11. Jasper, Daniel, Commemorating the “Golden Age” of Shivaji in Maharashtra, India and the Development of Maharashtra Public Politics, Journal of Political and Military Sociology, Vol. 31, No. 2, 2003.

Notes

[1] Dipesh Chakrabarty, The Calling of History: Sir Jadunath Sarkar and His Empire of Truth, The University of Chicago Press, 2015, p.7.

[2]  Ibid, p.8.

[3]  Cynthia Talbot, Inscribing the Other, Inscribing the Self: Hindu- Muslim Identities in Pre-Colonial India, Cambridge University Press, 1995, p. 693.

[4]  India Today, 15 Jan. 1993, p. 20.

[5]  Romila Thapar, The Verdict on Ayodhya: A Historian’s Perspective, The Hindu, Oct. 2,2010.

[6]  Prachi Deshpande, Creative Pasts; Historical Memory and Identity in Western India 1700-1960, Permanent Black, 2007, p.2.

[7]  William Dalrymple, India: The War Over History, The New York Review of Books, April 7, 2005 Issue.

[8]  Tanuja Kothiyal, 29 June, 2017, http://www.scroll.in

[9] Ibid.

[10]  Ramesh Thakur, Ayodhya and the politics of India’s Secularism : A Double Standards Discourse, Asian Survey, Vol. 33 , No. 7, University of California Press,1993

Women through the prism of Religion part-2

-Priyanka Kaushik

Gender is undeniably one of the most important factors of any society. Not only gender molds socio-cultural relations, dictates terms of interaction of the sexes and exposes the underlying structures of patriarchy, it also provides an epistemology to understand different processes in different temporal-spatial zones and understand and help understand aspects of colonialism, nationalism, caste, religion etc with a new lens. Over the time, different scholars have worked on different aspects of gender and have tried to understand various phenomenon and challenge the existing notions through its gender analysis.

The question of gender is one of the most debatable concepts of our times. With the coming of gender consciousness gender constructs are no longer seen as inevitable ones and those are studies like one by “Kate millet” to suggest the relation between sex relations and power, as she says-“personal is political”. So we need to see these processes and layers of the gendered structures intertwined in such a way that a superficial imposed structure after a time looks inevitable and natural to us.

Gender is a field of huge contestation as this is a field where there is a lack of consensus among scholars over the meaning, nature and extent of gender distinctions. Thus the historiography of gender analysis is a complex and subjective discourse and need to be analyzed within a set of socio-economic context.

John W. Scott in her work “Gender: a useful category of historical analysis” analyzes the concepts of gender and proposing how a new understanding of gender influences our understanding of history.

but Scott’s understanding of gender also cast its effect on the discipline of history altogether. her theory revolves around knowledge, meanings and truths as constructive discourse, a structure, a way of “ordering the world” which is not strictly predecessor  to social organization. that’s why according to John Scott, the discipline of history produces knowledge generally about the past. feminist history, in that context, is not restricted to just an attempt to correct or supplement an incomplete record of the past but rather a critical understanding of history as a “site of production of knowledge of gender in general and knowledge in general”.

she also points out that as soon as historians will acknowledge the multivalent and constructed nature of society and knowledge, they will be forced to abandon single cause explanations for historical change. Power is central to Scott’s analysis, for she is interested in the notion of equality, and she argues that by studying gender relations, one can gain an understanding of (in)equality in general.

for this, she calls for us to alter our understanding of power: “we need to replace the notion that social power is unified, coherent and centralized with something like Michel Foucault’s concept of unequal relationships, discursively constituted in social “field of force”. so, power is not something that exists outside the social organization and is then wielded by persons. “The point of new historical investigation”,  Scott writes, is to disrupt the notion of fixity, to discover the nature of the debate or repression that leads to the appearance of timeless permanence. in this view, attention should not be given solely to people’s actions, but instead to the meaning that people (and their actions) acquire through social interaction. lastly Scott believes that the process of constructing gender relations can also be used to discuss class, race, ethnicity or any social process. so, it is indeed a “useful category of historical analysis”.

the question of gender is one of the most debatable concept of our times. with the coming of gender consciousness “gender constructs are no longer seen as inevitable ones” and there are studies, like by Kate Millet  to suggest the relation between sex relations and power, as she says- “personal is political”. in the context of India, religion is one of that dominant aspect through which gender relations are defined as well as justified. Most of the times, the nature of these religious texts are prescriptive and normative, but still as religion and religious texts enter into popular consciousness, they try to form crystallized categories. religious  symbols, iconography etc support the texts in building these difference. we are concerned here not just with religion per say but the gendered relations over the years and how religion plays a dominant role in the proceedings.

though the sati-pratha was abolished in the 19th century through legislation in 1829, there was a resurgence of the sati movement in 1980’s in Rajasthan. the basis of this movement was harking back to the glorious tradition of the “sati-mata” which was an antithesis to the wave of feminist movement in India at the same time.

Nevertheless, religious symbols are put to use in a very different way to justify a movement. another irony  lies in the fact that the most staunch supporters of the movement were women themselves. thus, it actually reveals the process of legitimizing and “sacralizing” the institution and the rhetoric to create an illusion of a glorious tradition. thus, religious tradition could themselves then be used as a text to study the dynamics of gender and the process of legitimization through religion.

As Michel Foucault points out- church, educational institutions and hospitals were three spheres of “discursive discourse” of sexuality through which the domain of sexuality which was repressed in the sphere and locus of “legitimate sexuality” was able to manifest itself without harking to the “illegitimate” sphere of sexuality. power structure has an indelible presence in the realm of gender relations but whether the relations are always hierarchical or sometimes the relation is rhizomatic as well,, whether the power structure is has an overarching presence or it emanated from different nodes of interaction. in that sense, religion may prove very useful in not only studying these interactions of power structures of  gender, but how the process of signification in the rhetoric of gender, becomes an enigma that creates an illusion of a hidden meaning that have to be prized out through a commentary (as in different interpretations of religious texts) and which sometimes create meanings which doesn’t exist in the first place. through deconstructing the structure we have to analyze the women’s sphere through the prism of religion, and similarly through the prism of history.

.  WOMEN THROUGH THE PRISM OF RELIGION

अग्निपरीक्षा

शिव-धनुष जिसके लिए तोड़ दिया,

उस सीता को क्यों छोड़ दिया?

खैर मैं तुम्हें क्यों करूं संबोधित,

है जो मर्यादा पुरुषोत्तम घोषित।

मैं तो प्रश्न करुँगी जनकनंदिनी से,

कि तुम इस मृगतृष्णा में फँसी कैसे?

माना तुम्हें चुनना था एक वर,

और अयोध्या-कुमार से मिले तुम्हारे स्वर।

पर क्यों तुम्हारे मन ने प्रश्न न उठाया,

तुम्हारे सामने बिछी थी प्रेम रूपी माया।

वही प्रेम जो कहलाता है अँधा,

जिससे चल रहा है फरेब का धंधा।

क्यों वो झूठ तुम जान न पायी,

क्यों तुम विवाह करके अयोध्या आई?

उस आदमी को जब मिला वनवास,

तुमने किया अपनी इच्छाओं का ह्रास,

पहली अग्निपरीक्षा तो यही थी तुम्हारी,

पर तुम्हारे पति को नहीं हुआ विश्वास।

फिर भी तुमने हार न मानी,

वर्षोँ तक वन कि धूल छानी।

फिर एक दिन एक पुरुष आया,

जो पूरी दुनिया में दुष्ट रावण कहलाया।

ले गया अपहरण करके तुम्हें लंका,

और बजा दिया अपनी जीत का डंका।

उसका मन तुम पर था आया,

फिर भी हाथ तुम्हें उसने ना लगाया।

तुम्हारा तिनका था उसकी लक्षमण-रेखा,

जिसके पार कभी ना तुम्हें देखा।

फिर तुम्हारे परमेश्वर के भक्त आए,

तुम्हारी सुरक्षा का संदेशा लाए।

जीत के बाद उस मर्द ने फिर मांगी अग्निपरीक्षा,

और तब भी न मिली तुम्हें कोई शिक्षा।

उस अग्नि को तुमने ओढ़ लिया,

फिर भी पुरुषोत्तम ने मुँह मोड़ लिया।

मैं पूछती हूँ उस अग्नि में तुम भस्म क्यों न हो गयी,

क्यों लव-कुश को जन्म दिया?

क्यों उस समाज के आदेशों में तुम बंध गयी,

जिसने तुम्हें दुत्कार दिया।

आज भी वो राम समाज के कंधों पे है,

और गर्भवती सीता तुम उस समाज के क़दमों में।

इस मर्यादित समाज से मैं बहुत दूर भागती हूँ,

हे राम! आज मैं तुम्हें त्यागती हूँ।

 

कृति त्रिपाठी

History student in an ahistoric world

-SANTOSH KUMAR

Being a history student is not an easy task. You are questioned for choosing humanities after 10th (not all history students come from humanities background but many do) by your friends, relatives and even your own parents. By the time of your graduation you have a brilliant response for your defense-“I am preparing for UPSC!” but this article is not meant to elucidate the struggles of studying history but rather the struggles of a history student when he or she faces the world whose ideology and vision of historic seems to be Ahistorical. The struggle to deal with the historical myopia of the society and the struggle to convince yourself that you are doing nothing wrong in challenging those rigid traditions- religious, patriarchal, societal, cultural which are so imbibed in our day to day living that they seems to be eternal and inevitable unless we realize that these notions are in itself Ahistorical.

For most people history is nothing more than “bunch of facts”. It is easier to demarcate, categorize and classify than to critically analyze, introspect and be subjective. So people will expect from you to churn out facts, dates, events and it will be an arduous task to explain the developments in the study of history and how history is no longer a narrative of kings and battles. People get disappointed when they expect facts from us and we deliver theories. But this is not a simple individual problem, but rather I am pointing out to a grave social problem- conflicting ideologies, which see history just as a tool to justify and further their ideological claims. A history student even though steers away from generalizations, judgmental, objective facts and clear demarcation of categories, every word you speak is seen as a representation of some or other ideology (and mostly people believe in two extremes- right wing and left wing). So if you questioned the notion of “Akhand Bharat” or Gupta age as a “golden period”, you will be deemed a communist and vice-versa. Every day when I have discussions on history with people, I am met with sentences like- “are you a communist?”, “do you support the JNU row?”, and I have to remind myself and the person that it has hardly anything to do with our discussion. When people insist to categorize me in any of their pre-decided categories I have to offer them new categories like “post-structuralist” or “post-modernist” (I don’t claim to be a exponent of any of these categories) and a very amusing response I got was- “I can’t even pronounce it, how am I supposed to believe in it!?”  We live in a world where people believe history to be Ahistorical. So the whole ancient period (many people think it being equivalent to Hindu period) is a glorious period which turned into rubble with the onslaught of invaders (predominantly Muslim). In short, people envisage history as long periods of changelessness and vice-versa, sudden and phenomenal changes. People who have just heard the names of big historians like Romila Thapar, R.S. Sharma criticize them rather uncritically for writing incorrect history (what they actually mean is that views of these historians doesn’t fit with our understanding of history).

They want to demarcate good history from bad history, and heroes from villains. They just don’t want history; they need sociological categories with a peppering of facts and figures. And this ahistoricity is maintained consistently in defining culture, institutions, and people. So Nation is Ahistorical, origin of Indian culture is untraceable, mythology holds truth here, and any attempt to explain otherwise is met with contempt. Deep inside, there is a lack of appreciation of historical knowledge. Every person thinks he knows history, and history is no special knowledge, but ironically, most people and even the ruling regime try to alter history according to their own vision and reuirements. History becomes a tool of commemoration, something people can take pride in, driven by political exegesis, expressed in a language that is in most parts rhetorical and pragmatic to the extent of being adamant.

A history student is grieved when we see such disregard for history. When we give new names to places to suit our historical understanding, and in the process manipulate history. When we decide to commemorate a particular version of history which glorifies one strata of society over other, it shows our attitude towards history. History student scorns at the absurdity of historical shows which are not only factually inaccurate (this is the least thing we expect from them), but also manipulative, communal and provocative. And we hate when we have to clear the web for people who don’t see any difference between history and mythology. So people will ask you questions on historicity of Ramayana and Mahabharata and here lies the biggest misery of a history student, because most people are very sensitive to religious issues and any explanation, no matter how historically well placed may offend their feelings. Secondly, when people ask you question related to religion, they are actually testing you (and later blame your response to your English medium education and neglect of Indian culture) or they have pre-conceived notions about the issue and what they want is an affirmation of their viewpoints, and unfortunately this is one thing that our historical mind is unable to churn out. Forget strangers, distant friends, or relatives you can’t convince your own parents that you are talking out of historical curiosity and not vengeance against religion and nation (we are not anti-nationals, we are not iconoclasts of religion, and we are just students of history). People will give us snippets on the evidence of Ramayana and Mahabharata, or the greatness of their religion or civilization; you are left with only two options- either keep on debating, posing arguments and counter arguments with no avail, or to face palm and nod in affirmation. People hate historical insights in religion, so they would question the authenticity of history (what is history capable of? History is speculative or history is imperfect, you will never be able to solve the mystery of our culture no matter how much you try, you are product of orientalist education, these are all some jibes thrown to us).

Forget deconstruction of language, culture, traditions, people are not yet comfortable to go beyond the elitist paradigm of history, beyond the political contours which could be memorized in fingers, and because you can’t explain them in your language, you have to explain them in their language, but even this process seem futile, for people perceive history as chronology and account of kings and queens. How ironical is the condition where people are unwilling to know about their own existence because their mind is laden with accounts of a class unrelated to their past or present. They are better off either lamenting the loss of an elitist cultural glory or creating modern discourse out of an objective demarcation of categories of oppressor and oppressed. The world is not ahistoric, but the way we identify history, we have made our own existence Ahistorical. And by perceiving history as dead and buried past, we are making our present seem Ahistorical. Walking down the lanes, a history student see the changing histories- every moment of our existence that is part of history, he see the new history books of the new regime, the new nomenclatures for place, new commemoration, he is seeing history being changed every minute everywhere, but deep somewhere in the lanes of history, there is a tunnel where all changes are sucked by the darkness of mind, and all that is left is a stagnant world with a history that is so Ahistorical.

 

RĀMĀYANA TRADITION IN UTTRAKHAND: COMPARATIVE ANALYSIS OF KUMAUNI AND GARHWALI RĀMĀYANA

-SANTOSH KUMAR

M.A. HISTORY (F)

Ramayana is a very dynamic text. It exists in different cultures, in different forms, echoing different social ethos. Every tale has vivid descriptions of why and under which conditions a particular story or text has been written and these texts are responsive and reflexive to different telling of the story and within the same text, there is an element of self reflection[1]. Thus every tale though being placed at temporally and spatially a mythic time and space, the dynamics they reflect are very contemporary one.  I wish to do here, is to compare and contrast two local versions of Ramayana, originated in the regions of Garhwal and Kumaun in the state of Uttrakhand. Here, we must mention that there is nothing called an ‘original text’ and every so called “versions” of a text is in fact an entity in itself. So here we will study these local telling of Ramayana avoiding references to the “Vālmīki Ramayana” and treat them as primary texts.

 

There are a lot of similarities in the term of structure, folk elements and the content in both the Ramayanas.  But still there are some differences that we need to consider. The Kumauni Rāmāyana is a written text, but retains a lot of folk elements which makes it apt for recitation and performance. There are attempts to homogenize the text by introducing some literary devices into the text that are not found in the Garhwali Ramayana which remains a folk performative theatrical rendition of Ramayana even though printed versions of the Garhwali Rāmlīlā is available in Uttrakhand. The story in Kumauni Ramayana is narrated by luv-kush, sons of Rama whereas there is no narrator in the Garhwali Ramayana. While Kumauni Ramayana is written in Kumauni dialect, the Garhwali Ramayana is actually performed in Hindi and is known as Garhwali Ramayana because it is performed in the Garhwal region.

Here in my analysis, I will focus on two aspects of these texts. Firstly, a similarity found in both these texts and which is valid for many such texts- though the narrative is placed at a distant locus of time and space, almost immemorial and fictitious time and space, the ethos and values these telling represent are both contemporary in their feel and rooted in local traditions spatially. Secondly, we will try to understand the difference one finds in a text when it is undergoing a transition from oral telling to be put into writing. The whole argument about orality and textuality becomes very important here because we will see that the Kumauni Ramayana tries to develop itself into a literary text, while retaining the folk elements it possesses. Thus we can place the Kumauni Rāmāyana in a period of transition, from folk to literary written version. This transition has its own dynamics, while on one written text acquires a form which is accessible to a wider audience as well as provide homogeneity to the structure of the text (though there is a whole debate on the fluidity of the oral and written sources, we do find changes in the way both these texts come to us). On other hand, this transition also restricts the “inter-textuality” of the text[2]. It reduces the borrowings of textual material from other sources, in a way, that is possible for folk versions. Written sources also acquire a distinct style, language and even content that differentiates it with the locally rooted (in this context, the Garhwali Rāmāyana) telling. My analysis is based on comparison of two sources- one written version with elements of folk traditions, i.e. Kumauni Rāmāyana and an oral, folk, performative Garhwali Rāmāyana. This analysis and observations are text specific and may not apply to all such textual sources.

First, talking about the similarities, as said earlier, both the versions have certain folk elements, which give it a communal and performative aspect to the telling. So both the texts are composed in a mixed prose-verse style,  where verse have diverse functions to play- firstly, it acts as a narrative thread, and helps in effective narration of the story; secondly certain elements that can’t be performed are expressed through verses; thirdly, in terms of communal activity, these verses act as the medium through which a text is remembered through community singing and recitation of verses and fourthly, these verses represents the formulaic elements we find in the folk telling[3] (not necessarily all oral versions). But even here, we find certain differences in the approaches in the Garhwali and Kumauni Rāmāyana, as in the Kumauni Rāmāyana these verses are known as “hudki”, is used for either- for narration of the scene and the details of plots and character, or for expressing the inner psyche of the character- emotions, grieves etc. expressed through verses. On the other hand, the Garhwali Rāmāyana, apart from introducing the narrative and the scene, also use these verses to introduce characters, something that is, not found in the Kumauni telling. The reason for this difference can be ascribed to two factors- the performative aspect of Garhwali Ramayana pertaining to the Rāmlīlā tradition and secondly, the way the Kumauni Rāmāyana has been edited by its compilers/authors. Fancy introductions in the Rāmlīlā enhance the dramatic value of the performance. Also, there is a living tradition of mockery in parts of Uttrakhand, where people are mocked upon in festivals, occasions etc. for their extravagance, dressing styles, food habits etc. in good humor and that practices get reflected in their folk culture as well. The reason why this is not found in the Kumauni Rāmāyana can be seen in the introduction of the Kumauni Rāmāyana- “normally, in Rāmlīlā we find a tendency to mock kings etc for their dressing etc. but such ‘obscenities’ are not to be found here”. This also leads to our second point, that is, how a text is edited and acquires an all new meanings with the additions and deductions of the text.

So Kumauni Rāmāyana, which has some folk elements and which has been derived from folk versions of the Rāmāyana in Kumaun, is compiled not in Uttrakhand but rather in Delhi. Now, when a folk telling is edited to suit the aesthetics of a literary class, it acquires new language, new idioms and new representations. Two simultaneous and mutually contradictory activities are reflected in the Kumauni Rāmāyana. On one side, there has been attempt to reinforce the “pahari” identity and culture through the text and at the same time there has been a thorough editing and interpolations. Editor/compiler of the work attributed to Kundan Singh Manral ‘Pahadi’, himself was not just a passive compiler of the text but also had to make sense of the text in a particular context. The use of language is very significant here. The text is written in Kumauni dialect written in Devanagari script. Though there are attempts to use literary elements into the texts, the expressions used are not literary but more localized expressions and idioms. But conversely, there are some portions in the Kumauni Rāmāyana that seem to make the text a bit esoteric by introducing metaphysics and Upanişadic philosophy in the text perhaps targeting the urban literate class of Kumauni community and individuals in Delhi and in other regions as well, something that is not found in Garhwali Rāmāyana. So the “unsophisticated” material is edited out and new “sophisticated” material is infused in the text. Conversely, in the Garhwali Rāmāyana, there is hardly any metaphysical portion. So a very complicated question asked in this context- is there anything like the “original text” where every retelling of a narrative has its own variants. And can we identify any author of the text. If anyone interpolates and re-interpret the text, will he be considered an author, editor or compiler etc?[4] The transition from folk to literary version not only enhances but sometimes also restricts a text. While the Garhwali Rāmāyana borrows and takes inspiration from various sources from Rāmacharitmānas to even movie songs on some occasions, the nature of the Kumauni Rāmāyana restricts it from using any uncited, unacknowledged references from other sources.

Finally on the question of differences, as said earlier, though telling tale of a time immemorial, gives ethos of the contemporary times it is rooted in. both the text introduce many changes to the text, without altering the main story making the narrative more closer to the culture of the mountains. Apart from the changes in the narrative even the imageries reflected in the text gives you a peek at the culture and lives of the hilly regions. You can’t actually alter the story radically, what is altered are the motivations of the character, and the material culture reflected and additional conversations are added to express the local interpretation and emotions of the text. So, in Garhwali Rāmāyana, the character of Bāņāsur is introduced, who has a very interesting conversation with Rāvaņa during Sīta’s svayamvar where both try to outclass each other, thus exposing Rāvaņa’s weaknesses and ego. Kumauni Rāmāyana humanizes the villainous character of Manthara, by introducing Sumanta as the person responsible for provoking her, who then provoked Kakeyi to ask for boons. But apart from the new changes, there were minor touches in both the texts,   which reflect the “pahari” culture even within the framework of Rāmāyana tradition. So in the Kumauni Rāmāyana, the places Rāma visits during the years of exile have been placed in their local regions, and the folk they meet during their visits are introduced as “ghasyaris” (women grass cutters in Uttrakhand) thus localizing the narrative. In the Garhwali Rāmāyana, there are mentions of local products like beet-root, sweet potatoes, pumpkins (associated with the kings, thus localizing the royal culture), tobacco etc. within the framework of the narrative. There is a very significant scene in the Garhwali Rāmāyana, where Kevat the boatman, sings a song craving for tobacco.  We have already discussed that even movie songs were incorporated within the text perhaps it fit the situation, also because it was more easily relatable and it helps to make the text rooted in the local culture.

In conclusion, we may point out that different telling of Rāmāyana, apart from being part of a larger narrative tradition can also be seen as standalone texts on their own. This telling reflect their own dynamics, social pattern and cultural peculiarities and are placed in those local traditions as much they are linked to the larger tradition. Also, there has always been a debate related to orality and written sources, but here we must emphasize, that the relation between the two, though sometimes a bit uneasy is far from dichotomous. Both assimilate, overlap and influence each other. And written sources don’t indicate the end of the tradition in oral sphere, though this is also true, that when a folk tradition is written down, it just not indicate change of medium, but also language, audience, context and thus sometimes even content.  Thus here the narratives become part of both visual and oral archives.  . None of these sources are static but prevalent in textual and performative form in various places, even outside Uttrakhand in Delhi, Ghaziabad etc.  In this case texts themselves become an archive itself which needs to be critically analyzed like folklore because they try to construct meaning beyond the cultural context in which the folklore was actually constructed

 

Bibliography

  1. Pahadi, kundan singh manral- “Kumauni Rāmāyana”; New Delhi; Takshshila Prakashan; 2007
  2. Dharwadker, Vinay (ed.) – “The collected essays of A.K. Ramanujan”; New Delhi; oxford university press 1999
  3. Singh, Dhananjay- “Fables in the Indian narrative tradition”; New Delhi; D.K. print world pvt.ltd.

2011

  1. Bharucha, Rustom-“Rajasthan: an oral epic”; New Delhi; Penguin Books; 2003
  2. Ong, Walter J. – “Orality and Literacy”; London and New York; Methuen; 1982
  3. Lord, Albert B.- “Characteristics of Orality” inA Festschrift for Walter J. Ong, S.J., a special issue ofOral Tradition, vol. 2, no. 1 (1987), pp. 54–72.

 

 

 

 

 

 

[1] A.k. Ramanujan- “collected essays of A.K. Ramanujan” (1999), pp.7-8

[2] Roland Barthes, Julia Kristeva etc. worked on the inter-textuality of a text meaning no text is autonomous in itself but produced from other texts. See Dhananjay Singh, “fables in the Indian narrative” (2006), pp.164

[3] Use of formulas is one of the characteristics of father Ong’s description of “oral epics” though I have expanded the definition to include not just oral but different folk tales as well (written or unwritten). See Walter J. Ong- “Orality and Literacy: Technologizing of the Word” (1982)  and Albert B. Lord “Oral Traditions” (1987)

[4] Linguists like Roland Barthes questions the very assumption of an author as every text derives something from its predecessors, so there is neither original text nor any author. Rustam bharucha also asks this question that who is the author- the one who narrates the story or the one who compiles them. See, Roland Barthes in Dhananjay Singh’s “fables in the Indian narrative” (2006), pp. 164-66 and Rustam bharucha and Komal Kothari, “Rajasthan: an oral epic”