Existentialist Paradise….

existentialist crisis

1.Existentialist paradise….

A chimera an illusion
A diversion from the
Misery of your existence
A place to be imagined
Based on your perceived
Sense of pleasure

You try to free yourself
From the clutches of life
You try to break away
The walls that restricts you
Where relations kinsmen
Are no longer required
Where you can massage
Your body and your egos

Where you move from
One dull, listless, meaningless life
To a happening, fascinating
And a meaningless life
Where no other can gaze you
And make you feel small
For Paradise is a place
Where you fetishize on your own
Where you are full of, fed with
Different versions of commodities
And you end up being
Another version of commodity

Where you finally stop making
Sense of the world and realize
That the whole world
Is a place very futile
And you no longer care
Because you are fetishized
By the fetish itself.

 

2. Life is what life does

life is a mirage
a labyrinth an illusion
the whole purpose of existence
is to find a purpose of existence
to live with an identity
that is not mine
life is a ring
and you are thrown into it
you run, you slip
you growl and you kick
you cry and you shout
and learn all this while
how actually to fight
life is the dew the mist
and the fog
that blurs your vision
so that you can’t see
that everything is futile
life is a trap of a better tomorrow
or nostalgic remembrance of the dead-decayed past
life is the false hope
that you are alive
life is the fear of death
that keeps you awake
life is the creepy realization
of your mundane existence
life is what life does
nothing at all
nothing at all!!
3. Oppressed by  me….
I am oppressed
In every nook and corner
Through my very nature
Through my very existence
And I can’t cry alas
For I have internalized my oppression
I can’t complain oh god
For it is part of my being
I am not what I think I am
And I can’t complain
For I am my own oppressor
I am harassed
Whenever I try to exist
Beyond the shadows of
The existence bestowed on me
I am harassed
When I refuse
To condition according to
The need of society
When I gaze the
Gaze of patriarchy
When I revolt against the
Visible vestiges of my privilege
When I try to stop being
Fetish for someone else
Then I am devoid of
My own identity
The cloak of my perceived self
Masquerading the real me
Is snatched away from me
And I can’t do anything
For I am no longer me….
4. Slave of mine, master of mine….
the dialectic of consciousness
the labyrinth of existence
the crisis that unfolds
the mystery never resolves
my name- oh its not mine
someone named me and i am fine
why was i born- oh i don’t know
my parents took the decision
and i am the byproduct
now i want an identity
oh the society gave me many
my name, religion, caste, class, creed
language to articulate all emotions
a brigade of kinsmen and relations
i never knew who am i really
a reality, a consciousness
a dream, chimera, fantasy
a robot with a heart and mind
an animal with an erected spine
a phantom, a particle, an atom, a mole
a sperm, a cell, plasma, none of all
not energy, nor ray, nor wave or quantum
many identities i have
but none of my owni am not the stone that you can throw at will
nor am i the chestnut fruit
that falls now and then
i am the slave of mine
and the master of perceived
identity of mine
in between these two extremes
somewhere lies my existence

i asked, asked, asked and asked
i asked my present
and look into the past
my life is mess and i don’t know why
may be because i don’t know who am i

5. I am dead but I can’t die…..
death is the realization
that something in you
was alive till now
death comes with an assumption
that your existence was real
and not a mere facade
thousand deaths i die
in my heart every day
my wisdom is in comatose
my emotions paralyzed
my senses seem to be mere illusion
i am dead but i can’t die
to bear the brunt of my existence
i am still alive
to live not once
and die innumerable times
i am still alive
no hope no reason to live
but i am still alive
i am dead for me
but for the world
i am still alivei have the obligation to live
but not the right to die
my senses seem to be mere illusion
i am dead but i can’t die

सुसाइड……

“अगर हिम्मत नहीं थी तो मरने क्यूँ  आया?”

“अगर इतनी ही हिम्मत है तो मर क्यूँ रहा है”?

इन दो पंक्तियाँ गूढ़ विमर्श छुपा हुआ है. हमारे समाज में आत्मदाह को लेकर जितने विचार नहीं है उतनी भ्रांतियां है. हम लोग इस विषय पर बोलने को आतुर है पर समझने को अग्रसर नहीं. जीवन में सभी को कभी न कभी ये ख्याल आता है कि आखिर इस ज़िन्दगी का मतलब क्या है? क्यूँ जी रहा हूँ मैं? ज़िन्दगी बेज़ार लगती है और मौत आसान रास्ता. पर हम में ज़्यादातर लोग इस रास्ते को अख्तियार नहीं करते, शायद मौत का डर शायद ज़िन्दगी का मोह, शायद घरवालो की चिंता शायद दुनिया का ख़याल, बहुत से कारण होते है कि पाँव ठिठक जाते है. पर हमारे समाज में विडंबना अजीब है, हम लोगों को उनके फैसलों के लिए जज करते है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आत्मदाह का प्रयास विफल हो जाता है. सुसाइड किसी के मन की कमजोरी है या जुझारूपन की कमी ये निश्चित करने का अधिकार किसी को भी नहीं. “मेरे सामने भी तो आई थी ये समस्या मैंने तो आत्मदाह नहीं किया” ये वो बेहूदा वक्तव्य है जो टूटे हुए इंसान को और तोड़ने का काम करता है. जीवन की आशा जिसमे खो गयी हो उसपर सवाल उठाकर आप सिर्फ उसको और नीचे गिरा सकते हो. सुसाइड का तो आधार ही ये है कि जब इंसान को जीने का कोई रास्ता नहीं दिखता (यद्यपि रास्ते होते है). ज़रूरी नहीं कि आत्मदाह सोच समझ के किया जाए, कई बार तैश में आकर या क्षणिक असंतुलन का भी परिणाम होता है पर ऐसा भी नहीं कि आत्मदाह मूर्खता है. किसी के लिए उसका जूता खो जाना भी बहुत बड़ा दुःख है, निर्भर करता है व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या है. समस्या तो ये भी है कि हमारे समाज में मनोरोगी को पागल और मनोचिकित्सक को पागलो का डॉक्टर मान लिया जाता है. तो अगर आपको समस्या भी है तो आप बताएँगे नहीं और बताएँगे नहीं तो आपकी कुंठा आपको अन्दर ही अन्दर खा जाएगी. और फिर जो आत्मदाह करने जायेगा वो महज एक खोखला शरीर होगा.

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग न नातों का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहां आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं.

आत्मदाह करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी अस्मिता को खो चुका होता है या अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहा होता है. अपनी काय को नष्ट करने का एक अभिप्राय ये भी है कि हम अपनी काया को अपना अस्तित्व मानकर बैठे है. मैं यहाँ आत्मा परमात्मा के विषय में बात नहीं कर रहा अपितु उस सत्य को इंगित कर रहा हूँ जो कई सालो पहले sartre ने कहा था- हम स्वयं को को चेतना के रूप में देखते है और दुसरे हमें काया के रूप में. आशय ये है कि जब हम आत्मदाह करने जा रहे है तो हम अपने अस्तित्व को भूला बैठे है. हम दिखती है तो बस एक काया. सुसाइड को जज करने से पहले उसे समझने की ज़रुरत है. हम सब को सहारा चाहिए अपना, दूसरो का, कम से कम भगवान् का. जब व्यक्ति आत्मदाह के लिए प्रेरित होता है तो वास्तव में वो अपना ही सहारा नहीं बन पाता. और इसलिए सुसाइड हर समय एक नया विमर्श खड़ा कर देता है- सुसाइड करना क्या वास्तव में इंसान का अपने शरीर पर हक को प्रमाणित करता है? या वास्तव में ये वो पल है जब मानव अपने आप पर ही हक खो बैठता है. प्रश्न विकट है  इसपर विमर्श चाहिए वार्तालाप चाहिए आक्षेप नहीं विवाद नहीं.

कितना आसान है रुला देना किसी को

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें और ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें और सर्द चाहिए….A New Design (2)

मेरा होना…..

-संतोष कुमार

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पल भर को मन को खुश कर जाती

झूठी आशाएं

कडवी हकीक़त से दूर ले जाती

झूठी आशाएं

दिल में एक मिठास जगाती

झूठी आशाएं

सच्ची सी लगती है ये

झूठी आशाएं

आँख खुलते ही टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

आती है हँसाकर जाती है रुलाकर

झूठी आशाएं

दिल में दर्द दे जाती है

झूठी आशाएं

तारो की तरह टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

बड़ी झूठी होती है ये

झूठी आशाएं

 

 

 

अपने होने को होना कहूँ तो न होना क्या है। जब वजूद पर न यकीन हो न उससे कोई आशा तो ऐसा वजूद हम पर बोझ नहीं तो क्या है। रिश्तों के साथ समस्या बड़ी है कुछ बने बनाए आते है कुछ हम खुद बनाते है पर एक बार बना लेने पर रिश्ते बेड़ी बन जाते है। रिश्ते निभाना क्यों जरूरी है ये तो बाद का सवाल है रिश्ता होना ही क्यों चाहिए। अगर हम अकेले खड़े हो तो क्या हमारा अस्तित्व है, अगर नहीं तो ऐसे अस्तित्व का करना ही क्या जो हमारा है ही नहीं जो दूसरों पर निर्भर है। मैं दुनिया में आया मेरा फैसला नहीं था तो इस ज़िन्दगी को निभाना हमारी ज़रुरत क्यों। अगर भगवान् ने सचमुच हमें बनाया है तो मैं पूछना चाहता हूँ कि क्यों? दुनिया बनायीं ही क्यों? हमको बनाया ही क्यों? हमको ज़बरदस्ती कुएँ में धकेल देते है और कहते हो इसी में रहो और अगर बाहर निकलना हो तो मेरा आह्वाहन करो। मुझे दया आयी तो तुम्हे बाहर निकाल दूंगा। अगर उभरना ही हमारी मंज़िल है तो हम खायी में जाए ही क्यों? पहले जहन्नुम सी ज़िन्दगी देते हो फिर कहते हो अपना अस्तित्व खोजो। अपने जीवन का उद्देश्य खोजो। परंतु क्या जीवन का उद्देश्य खोजना ही सबसे बड़ा उद्देश्य नहीं है। इसी उद्देश्य के बूते तो हम अपनी अस्तित्व की सार्थकता प्रमाणित करेंगे। कोई शास्त्र पढ़ेंगे कोई दर्शन की किताब, कुछ चिंतन करेंगे पर प्रमुखतया जो भी सामने होता है हमारे उसे आत्मसात करेंगे। जिस दिन प्रश्न पूछ लिया उस दिन हमारा अस्तित्ब संकट में पड़ जायगा इसलिए शास्त्रों में विदित है कि ईश्वर पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले उसके कोप के भागी होंगे। तो हम कभी कुछ नहीं पूछते मान लेते है कि हम कुछ है, क्या है नहीं पता, क्यूँ है नहीं पता.

दुनिया के रहस्य जानने निकले है खुद की हमको सुध नहीं है, चाँद तारे तोड़ने निकले है अपने दिमाग में क्या चल रहा है उस सोच तक हमारी पहुँच नहीं. हम बिना भाषा के सोचते कैसे है? क्या बिना भाषा के सोचा जा सकता है, अगर हाँ तो कैसे? अगर ना तो कौन हमें सोचना सिखाता है, कौन हमें बताता है कि मैं मैं हूँ? क्यूँ मैं आईने में देखकर खुद को पहचान लेता हूँ लेकिन लाखों करोडो सालो की साधना से भी खुद को नहीं पहचान पाता. समाज के होने से मैं हूँ या मेरे होने से समाज है, रिवाज़ मैंने बनाये है या मेरे लिए ये रिवाज़ है, ये सांस मेरे लिए बनी है या मैं लेता हूँ तो ये हवा सांस है, क्या मेरी आवाज़ से बनते है ये शब्द या मेरे शब्दों में आवाज़ है? एक भैया कहते है ये “जेहन-ए-अय्याशी” है सब, जितना सोचोगे उतना मज़ा आएगा, तृप्ति मिलेगी सुकून मिलेगा, और सोचने का जूनून मिलेगा. बस जवाब नहीं मिलेगा. क्यूंकि हमें इस सोच में ही इतना मज़ा आ रहा है कि उत्तर तो हम जानना ही नहीं चाहते, और सच तो ये भी है कि उत्तर कुछ है भी नहीं. बस नए सवाल है, बस नए विचार है.

 

कह दूँ सब पॉवर स्ट्रक्चर है, मेरी अस्मिता थोपी गयी है मुझपर मेरा अस्तित्व उसको आत्मसात करना मेरा लक्ष्य है, या मेरा जीवन एक निरर्थक परिपाटी है जिसका अर्थ निकलकर ही जीवन को जीना संभव नहीं. क्यूंकि सबमे ये क्षमता नहीं कि जीवन का अर्थ निकाल सके. तो या तो वो जीवन भर अपने अस्तित्व से अनिभिज्ञ रह जाते है या धर्म, आस्था, मिथकों में अपना अस्तित्व तलाशने लगते है. या बोल दूँ सब ईश्वर की देन है क्यूंकि ये जवाब देते ही सोचने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है. जवाब कितना ठोस है नहीं पता, पर कम से कम जवाब तो है, जेहन-ए-अय्याशी तो नहीं. सब कुछ जो होता है उसमे हमारा योगदान सिर्फ कलाकारों का है क्यूंकि करने वाला तो कोई और है. मतलब कुछ भी हो, हमारा अस्तित्व किसी की देन है, हमारा खुद का क्या है ये सवाल फिर से जेहन में आता है, भगवान् आखिर हमारे साथ क्यूँ जुड़ा है इसका जवाब फिर नहीं मिलता. एक बार फिर गोल घेरे में ज़िन्दगी फँस जाती है.

 

और फिर कोई हमें झकझोरता है और कहता है- क्यूँ इतना सोचते हो? सोच सोचकर ज़िन्दगी को और अधिक क्लिष्ट क्या बनाना और सच भी है. जीवन को सुलझाने से बड़ी उलझन कुछ नहीं, मौत से बड़ी ज़िन्दगी की कीमत कोई नहीं. तो क्यूँ ज़िन्दगी को और उलझाया जाए. क्या फर्क पड़ता है कि हमारे होने का कोई आशय नहीं हमारे पास, बस एक एहसास है कि हम है, दूसरो के पास एक नाम है हमें बुलाने को, एक पहचान है हमें याद करने की, जिसे हम मानते है पर जो हमारी  नहीं है. तो ओढ़ लो चादर और खो जाओ अँधेरे में. अस्तित्व के मच्छर काटेंगे तो नहीं.

 

 

जब कल का डर

आज हमे सोने ना दे,

बेहतर है झूठी

उम्मीदों  के सहारे सो जाना

 

झूठ का सच

कृति त्रिपाठी

झूठ की खासियत है अनोखी

लगता है अपने आप में सम्पूर्ण.

धूल दूसरों की आँख में झोंकी

और मानते हो खुद को परिपूर्ण।

सच को तो कभी याद रखना ना होता

और झूठ भूलने का सवाल ही पैदा ना होता,

सच और झूठ की लड़ाई में

विजय झूठ की होती है,

क्योकि सच में साबित करने की गुंजाइश कहाँ होती है।

ये कहानी आखिर शुरू कैसे होती है?

एक सच को छुपाने पर

पहला झूठ अपने आप बन जाता है,

फिर आने वाले कई झूठ में

वो अपने आप तब्दील होता जाता है।

चेहरे पर इतने मुखौटे चढ़ा लिए जाते हैं,

कि इंसान खुद को पहचान ही नहीं पाता है,

मज़े की बात तो ये है,

कि चेहरे पर चढाए इन चेहरों से,

तुम दूसरों को नहीं,

बल्कि अपने आप को धोखा देते हो,

आवाज़ ही न सुनाई दे कभी,

इस कदर अन्तरात्मा को मार देते हो।

इंसान इतना पत्थर होता जा रहा है,

कि दूसरों के आंसू देखने में उसे आनंद आ रहा है।

झूठ के इस पैमाने को इतना भी न भरो,

कि छलक कर तुम्ही पर गिर जाए।

सब्र की इतनी इन्तेहा न लो,

कि बाँध ही टूट कर ढह जाए।

किसी की अच्छाई को उसकी कमजोरी न समझो,

कि इंसानियत से भरोसा ही उठ जाए।

तीर जैसे इन शब्दों से इतना भी न भेदो,

कि लहू का रंग ही सफ़ेद पड़ जाए।

रोने पे इतना भी मजबूर न करो ,

कि आँखें ही सूख जाए।

किसी को इतना भी मत डराओ,

कि डर ही ख़तम हो जाए।

इतने काफिर भी न बनो,

कि खुदा के दर से ही शर्म आए।

इतने झूठ भी न बुनो,

कि सच की परिभाषा ही फिर याद न आए।

खैर झूठ के बुने इस जाल में

एक दिन खुद को जकड़ा पाओगे,

क्योंकि आसमान में थूकने वाले को ये पता नहीं

कि पलट कर थूक उसी के मुँह पर आकर गिरता है,

और एक दिन ऐसा आता है

जब आईना भी तुम्हारी शिनाख्त करने से मुकरता है।

और तब अपने अस्तित्व का सच खोजने निकलना,

जो पाप किये हो उन्हें गंगा में धोने निकलना,

लेकिन ये बात याद रखना,

कि उस दिन गंगा में पानी नहीं होगा,

पर जिस रेगिस्तान से तुमने बेईमानी की है,

वहाँ कभी न मुरझाने वाला एक फूल ज़रूर खिला होगा ।

कल आज और कल

कल तक थे जो मोम से पिघले,

खुद को आज पत्थर बना बैठे,

किसी और में जन्नत ढून्ढने निकले,

खुद को जहन्नुम बना बैठे।

कल ही की तो थी जान पहचान,

आज फिर अजनबी हो गए,

अपने आप पर था बहुत गुमान,

क्यों किसी के लिए सदियों रो गए?

कल तक देखा भी न था जिसका चेहरा,

आज उस गली में है,

अब देंगे इसके बाहर पहरा,

कोई और न गुज़रे इस खलबली में हैं।

कल तक जो बातें सुनते थे,

आज हम भी कर रहे हैं,

कल तक जिसके कसीदे पढ़ते थे,

आज वो हमारे तंज़ में है।

कल तक था जिसका इंतज़ार,

आज वो अपने रंग में है,

हमारा भी जल्द उतरेगा खुमार,

हम भी अब मैदान ए जंग में है।

कल तक था जिस पर ऐतबार,

आज उसे परवाह ही नहीं,

फिर भी हमने किये आंसू बेकार,

जिसका कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं।

कल तक था जो मेरा भगवान्,

आज उसका नामोंनिशान ही नहीं,

क्या छुपाएँ अब अपनी पहचान,

फिर से बन गए हैं काफिर हम वही।

कल तक था मन में अँधेरा,

रूह में कहाँ बची थी जान,

पर कल होगा फिर एक सवेरा,

नयी नज़र से देखेंगे वही पुराना जहान।

कृति त्रिपाठी